Thursday, July 22, 2010
उत्पीड़न के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग
उत्पीड़न के खिलाफ सड़कों पर उतरे लोग
सहारनपुर। प्रदेश सरकार की किसान विरोधी नीतियों से गुस्साए भाकियू कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरकर धरना प्रदर्शन किया। जिससे घंटों जाम की स्थिति बनी रही। किसानों ने गांधी पार्क से लेकर कलक्ट्रेट तक जुलूस निकाला।
बुधवार सुबह से ही जिले के विभिन्न इलाकों से ट्रैक्टर ट्राली आदि से किसान गांधी पार्क में जुटने लगे थे। भाकियू कार्यकर्ताओं ने बैठक की और फिर सड़कों पर उतर आए। प्रदेश उपाध्यक्ष विनय कुमार, मंडल अध्यक्ष सरदार मनमोहन सिंह और जिलाध्यक्ष चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में किसान घंटाघर पर बीच चौराहे में बैठ गए। वहां से दीवानी कचहरी पहुंचने पर किसान फिर से सड़क के बीच बैठ गए। यहां पुलिस ने समझा बुझाकर उन्हें आगे चलने के लिए तैयार किया। कलक्ट्रेट तिराहे पर पहुंच कर किसानों ने फिर से सड़क को आसन बना लिया ।
प्रतिनिधिमंडल ने किसानों के उत्पीड़न सहित अन्य मांगों को लेकर सिटी मजिस्ट्रेट को ज्ञापन सौंपा। गंगोह ब्लाक अध्यक्ष रामवीर सिंह, चौधरी अशोक कुमार मौजूद रहे।
सहारनपुर। प्रदेश सरकार की किसान विरोधी नीतियों से गुस्साए भाकियू कार्यकर्ताओं ने सड़कों पर उतरकर धरना प्रदर्शन किया। जिससे घंटों जाम की स्थिति बनी रही। किसानों ने गांधी पार्क से लेकर कलक्ट्रेट तक जुलूस निकाला।
बुधवार सुबह से ही जिले के विभिन्न इलाकों से ट्रैक्टर ट्राली आदि से किसान गांधी पार्क में जुटने लगे थे। भाकियू कार्यकर्ताओं ने बैठक की और फिर सड़कों पर उतर आए। प्रदेश उपाध्यक्ष विनय कुमार, मंडल अध्यक्ष सरदार मनमोहन सिंह और जिलाध्यक्ष चौधरी चरण सिंह के नेतृत्व में किसान घंटाघर पर बीच चौराहे में बैठ गए। वहां से दीवानी कचहरी पहुंचने पर किसान फिर से सड़क के बीच बैठ गए। यहां पुलिस ने समझा बुझाकर उन्हें आगे चलने के लिए तैयार किया। कलक्ट्रेट तिराहे पर पहुंच कर किसानों ने फिर से सड़क को आसन बना लिया ।
प्रतिनिधिमंडल ने किसानों के उत्पीड़न सहित अन्य मांगों को लेकर सिटी मजिस्ट्रेट को ज्ञापन सौंपा। गंगोह ब्लाक अध्यक्ष रामवीर सिंह, चौधरी अशोक कुमार मौजूद रहे।
प्रशासन ने मजबूर होकर खोला कलक्ट्रेट का गेटJul
प्रशासन ने मजबूर होकर खोला कलक्ट्रेट का गेटJul 22, 12:52 amबताएं
Twitter Delicious Facebook बिजनौर : किसानों की भीड़ के सामने बुधवार को प्रशासनिक अफसर बेबस नजर आए। आनन-फानन में ग्यारह किसानों को कलक्ट्रेट में घुसने की अनुमति दी गई, किंतु करीब 25 किसानों ने एडीएम से मुलाकात कर अपनी बात कही।
भारतीय किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष चौधरी राजेंद्र सिंह, धीर सिंह बालियान, ठाकुर गजेंद्र सिंह, लुध्यिान सिंह, मूला सिंह, ओमपाल सिंह की अगुवाई में बुधवार को सुबह ग्यारह बजे चक्कर चौराहे पर एकत्र हुए। यहां से जुलूस के रूप में ट्रैक्टर ट्रालियों में सवार किसान शास्त्री चौक, सिविल लाइन, मुख्य डाकघर होते हुए कलक्ट्रेट के बाहर पहुंचे, किंतु प्रशासनिक अफसरों के इशारे पर सुरक्षाकर्मियों ने कलक्ट्रेट गेट बंद कर दिया। यहां किसानों की एसडीएम सदर एसबी सिंह से नोक झोंक भी हुई। प्रशासन के इस तुगलकी फरमान से खफा किसानों ने ऐलान कर दिया कि यदि पांच मिनट में गेट नहीं खुला तो गेट तोड़ दिया जाएगा। स्थिति को देख बैकफुट पर आए प्रशासनिक अफसरों ने 11 किसानों को ज्ञापन देने के लिए यूनियन के जिलाध्यक्ष चौधरी राजेंद्र सिंह को राजी कर लिया। कलक्ट्रेट का गेट खुलते ही करीब 25 वरिष्ठ किसान नेता एडीएम (प्रशासन) के कक्ष में ज्ञापन देने पहुंच गए। एडीएम को दिए ज्ञापन में पेट्रोलियम पदार्थो की बढ़ी कीमतें वापस लेने, 20 घंटे बिजली दिलाने, स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को लागू करने, बकाया गन्ना मूल्य का भुगतान कराने, चीनी मिलों की बिक्री पर रोक लगाए जाने समेत 20 सूत्रीय समस्याओं के निदान की मांग की गई। ज्ञापन देने वालों में बिजेंद्र सिंह, डालचंद, लक्ष्मीनारायण, पूर्व जिलाध्यक्ष मोहम्मद आसिफ खां, महावीर सिंह, धूम सिंह, चक्रधर शर्मा, बाबूराम तोमर, जितेंद्र पहलवान, मंगल सिंह फौजी, गिरिशचंद शर्मा समेत अनेक किसान मौजूद थे।
Twitter Delicious Facebook बिजनौर : किसानों की भीड़ के सामने बुधवार को प्रशासनिक अफसर बेबस नजर आए। आनन-फानन में ग्यारह किसानों को कलक्ट्रेट में घुसने की अनुमति दी गई, किंतु करीब 25 किसानों ने एडीएम से मुलाकात कर अपनी बात कही।
भारतीय किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष चौधरी राजेंद्र सिंह, धीर सिंह बालियान, ठाकुर गजेंद्र सिंह, लुध्यिान सिंह, मूला सिंह, ओमपाल सिंह की अगुवाई में बुधवार को सुबह ग्यारह बजे चक्कर चौराहे पर एकत्र हुए। यहां से जुलूस के रूप में ट्रैक्टर ट्रालियों में सवार किसान शास्त्री चौक, सिविल लाइन, मुख्य डाकघर होते हुए कलक्ट्रेट के बाहर पहुंचे, किंतु प्रशासनिक अफसरों के इशारे पर सुरक्षाकर्मियों ने कलक्ट्रेट गेट बंद कर दिया। यहां किसानों की एसडीएम सदर एसबी सिंह से नोक झोंक भी हुई। प्रशासन के इस तुगलकी फरमान से खफा किसानों ने ऐलान कर दिया कि यदि पांच मिनट में गेट नहीं खुला तो गेट तोड़ दिया जाएगा। स्थिति को देख बैकफुट पर आए प्रशासनिक अफसरों ने 11 किसानों को ज्ञापन देने के लिए यूनियन के जिलाध्यक्ष चौधरी राजेंद्र सिंह को राजी कर लिया। कलक्ट्रेट का गेट खुलते ही करीब 25 वरिष्ठ किसान नेता एडीएम (प्रशासन) के कक्ष में ज्ञापन देने पहुंच गए। एडीएम को दिए ज्ञापन में पेट्रोलियम पदार्थो की बढ़ी कीमतें वापस लेने, 20 घंटे बिजली दिलाने, स्वामीनाथन समिति की सिफारिशों को लागू करने, बकाया गन्ना मूल्य का भुगतान कराने, चीनी मिलों की बिक्री पर रोक लगाए जाने समेत 20 सूत्रीय समस्याओं के निदान की मांग की गई। ज्ञापन देने वालों में बिजेंद्र सिंह, डालचंद, लक्ष्मीनारायण, पूर्व जिलाध्यक्ष मोहम्मद आसिफ खां, महावीर सिंह, धूम सिंह, चक्रधर शर्मा, बाबूराम तोमर, जितेंद्र पहलवान, मंगल सिंह फौजी, गिरिशचंद शर्मा समेत अनेक किसान मौजूद थे।
Friday, June 18, 2010
BKU supports strike against land acquisition from farmers
Haridwar, June 1
A major boost was provided to Bharat Heavy Electricals Limited (BHEL) land displaced farmers who are on an indefinite stir against the BHEL management, with the Bharatiya Kisan Union (Tikkait) coming in support of the agitators.
A visit was paid by executive members of the Tikkait union at Roshanabad where the farmers have been agitating for the past 43 days.
Led by state general secretary Baljor Singh, the delegation assured full support to the displaced farmers union and said the district administration and BHEL management should instantly meet the demands of the agitators otherwise it would have to face serious consequences.
While the agitating union is demanding BHEL management to allot lands to the displaced farmers who gave their land to set up of the BHEL unit in Ranipur in the ’60s and ’70s. The union is demanding of providence of one job each to the family of the displaced farmers so that they can live normal life as of now they neither have land nor the jobs.
Chief of the agitating union Tilak Ram Saini thanked the support ushered by the Tikkait union and said with this in the second month of agitation a new lease of life had been put into the farmers and now they would press more strongly for their demands fulfilment.
While warning of taking the movement aggressively, Irfan Ali, general secretary of the farmers union, said if the stance of the BHEL management and district administration continued thus, they would be taking the agitation route in a more aggressive manner.
Alongside resentment was also seen among the farmer leaders over the arrest of Sanjay Chaudhari, district chief of Haridwar, by the police on charges of blocking roads as part of protesting. Unanimously, both union leaders demanded the release of Sanjay terming protests as part of democracy and if the administration carried on such acts, then the very spirit of democracy was hurt.
Among others who addressed the agitation were Chaudhari Harendra, Taufeel Ahmed, Atar Singh, Raw Achan, Rao Jahid, Balwant Saini, Anand Saini, Kushal Veer Singh, Rajendra Singh, Virendar Singh, Sunil Kumar, Fakish Khan, Chaudhari Darendra Singh Om Prakash and Vijay Kumar Shastri of the Tikkait union.
A major boost was provided to Bharat Heavy Electricals Limited (BHEL) land displaced farmers who are on an indefinite stir against the BHEL management, with the Bharatiya Kisan Union (Tikkait) coming in support of the agitators.
A visit was paid by executive members of the Tikkait union at Roshanabad where the farmers have been agitating for the past 43 days.
Led by state general secretary Baljor Singh, the delegation assured full support to the displaced farmers union and said the district administration and BHEL management should instantly meet the demands of the agitators otherwise it would have to face serious consequences.
While the agitating union is demanding BHEL management to allot lands to the displaced farmers who gave their land to set up of the BHEL unit in Ranipur in the ’60s and ’70s. The union is demanding of providence of one job each to the family of the displaced farmers so that they can live normal life as of now they neither have land nor the jobs.
Chief of the agitating union Tilak Ram Saini thanked the support ushered by the Tikkait union and said with this in the second month of agitation a new lease of life had been put into the farmers and now they would press more strongly for their demands fulfilment.
While warning of taking the movement aggressively, Irfan Ali, general secretary of the farmers union, said if the stance of the BHEL management and district administration continued thus, they would be taking the agitation route in a more aggressive manner.
Alongside resentment was also seen among the farmer leaders over the arrest of Sanjay Chaudhari, district chief of Haridwar, by the police on charges of blocking roads as part of protesting. Unanimously, both union leaders demanded the release of Sanjay terming protests as part of democracy and if the administration carried on such acts, then the very spirit of democracy was hurt.
Among others who addressed the agitation were Chaudhari Harendra, Taufeel Ahmed, Atar Singh, Raw Achan, Rao Jahid, Balwant Saini, Anand Saini, Kushal Veer Singh, Rajendra Singh, Virendar Singh, Sunil Kumar, Fakish Khan, Chaudhari Darendra Singh Om Prakash and Vijay Kumar Shastri of the Tikkait union.
Wednesday, February 10, 2010
Mahamahim say mangi maut..
यह एक ऐसे किसान की कहानी है जो सोलह साल से भू माफियाओं से अपनी चार एकड़ जमीन को बचाने के लिए सत्ता से संघर्ष कर रहा है और अब वह थक-हार कर आत्महत्या करना चाहता है. लंबे संघर्ष और कोर्ट कचहरी के चक्कर ने न केवल गरीब चंदन सिंह बंजारा की कमर तोड़ दी है बल्कि उसके ऊपर हजारों का कर्ज भी लाद दिया है.
11 लोगों का परिवार चलाना उसके लिए अब मुश्किल हो गया है. उपर से अधिकारियों ने उसे एक लाख रूपये का ट्यूबेल के बिजली का बिल थमा दिया है. लिहाजा, चंदन सिंह अब दर–दर ठोकरें खाने की बजाए अपनी इहलीला ही समाप्त कर देना चाहता है. लेकिन आत्महत्या करना यहां कानूनन जुर्म है. चंदन सिंह बंजारा अधिकारियों के सामने कई बार आत्महत्या का प्रयास कर चुका है. लेकिन हर बार लोगों ने उसे बचा लिया. एक बार जिला मजिस्ट्रेट के सामने आत्महत्या के करने के प्रयास में चंदन सिंह को 14 दिन हवालात में भी बिताने पड़े. जब चंदन ने हवालात से बाहर आने से इनकार कर दिया (चंदन का कहना था कि हवालात में उसे रोटी मिल रही है घर में भूखा रहना पड़ता है.) तो पुलिस उसे जबरन गांव छोड़ गई. लिहाजा, इस बार वह राष्ट्रपति से मय परिवार सामूहिक आत्महत्या की इजाजत देने की गुहार लगा रहा है.
इस कहानी के पात्र हैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरपुर जिले के कैराना तहसील के याहियापुर गांव के रहने वाले अनुसूचित जनजाति के साठ वर्षीय चंदन सिंह बंजारा. 20 साल पहले एक सरकारी घोषणा ने इनके जीवन में जहर घोल दिया है. किसानों के लिए लाभदायी इस घोषणा ने चंदन सिंह को लाभ पहुंचाने की बजाए मौत को गले लगाने के लिए विवश कर दिया है. सरकारी अमले में बैठे भ्रष्ट अधिकारियों ने धोखे से चंदन सिंह बंजारा की जमीन को भूमाफियाओं को बेच दिया. बात सन 1985 की है. ये दिन चंदन सिंह की खुशहाली के दिन थे. तब मेहनतकश इस किसान ने अपने खेतों में ट्यूबेल लगवाने के लिए सरकार से 10 हजार रुपए का कर्ज लिए थे. पांच सालों में उसने कर्ज के करीब 5,700 रुपये वापस कर दिए. इसी दौरान जनता दल की वीपी सिंह सरकार ने किसानों के 10 हजार रुपये तक के कर्ज माफ करने की घोषणा की. इस घोषणा से चंदन सिंह फूले नहीं समाए. चंदन सिंह बंजारा कहते हैं, ‘‘तब एक दिन कुछ सरकारी कर्मचारी मेरे घर आए और बताया कि तुम्हारा कर्जा माफ हो जाएगा, लेकिन इसके लिए तुम्हें हमें दो हजार रुपये देने पड़ेंगे.’’ चंदन सिंह बंजारा के तब इतने पैसे नहीं थे. एक बार उन्होंने सोचा की साहूकार से कर्ज लेकर वह कर्मचारियों को रिश्वत दे दें, लेकिन फिर उन्हें लगा कि जब सरकार ने घोषणा कर दी है तो जब सबका कर्ज माफ होगा तो उनका भी होगा. लेकिन चंदन सिंह ने गलत सोचा था. रिश्वत के भूखे सरकारी बैंक के कारिंदों ने चंदन सिंह का नाम कर्ज माफी की सूची में शामिल नहीं किया. लेकिन इसके बाद जो कुछ हुआ उसने चंदन सिंह की कमर तोड़ दी.
फरवरी, 1992 में उन्हें तहसीलदार के यहां से एक नोटिस मिलता है तो उनके पांव के नीचे से जमीन खिसक जाती है. यह कर्ज की रिकबरी का आदेश था. इस रिकबरी आदेश के मुताबिक चंदन सिंह की बकाया कर्ज राशि मय ब्याज सहित 12,384 रूपये हो चुकी थी और इसे फौरन सरकारी खजाने में जमा करने का आदेश था. चंदन सिंह के पास इतने पैसे नहीं थे. लिहाजा, कर्ज अदायगी न कर पाने के बाद पुलिस चंदन सिंह को पकड़ कर थाने ले गई और उन्हें 14 दिन तक हिरासत में रखा. अंगूठाटेक चंदन सिंह बंजारा भोलेपन से कहते हैं, ‘‘मैं पढ़ा लिखा नहीं हूं, मुझे लगा कि जब मुझे जेल हो गई तो अब मेरा कर्ज माफ हो गया और पैसा नहीं देना पड़ेगा. इसके बाद मुझे कभी रिकबरी का नोटिस भी नहीं आया.’’
इस घटना के करीब तीन साल बाद एक दिन चंदन सिंह बंजारा की जमीन पर कब्जा करने कुछ लोग आते है और उन्हें पता चलता है कि सरकार ने कर्ज अदायगी न कर पाने के एवज में उनकी 21 बीघे जमीन को 19 जुलाई, 1994 को हरबीर सिंह को नीलाम कर दिया है. हैरान परेशान चंदन सिंह भारतीय किसान यूनियन के नेताओं से संपर्क करते हैं. यूनियन और गांव के लोगों ने मिल कर फिलहाल तब जमीन पर कब्जा नहीं होने दिया. इसके बाद भी जब जमीन मालिक चंदन से कब्जा लेते आता गांव और यूनियन के लोग एकजुट होकर उसे गांव से भगा देते. फिलहाल जमीन चंदन सिंह के ही कब्जे में है. बाद में यूनियन के नेताओं की तहकीकात से इस बात का खुलासा हुआ की कैसे तहसीलदार और पटवारी की मिलीभगत से चंदन सिंह की जमीन को गुपचुप तरीके बेच दिया गया. इस मामले को लेकर आंदोलन चलाने वाले भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश उपाध्यक्ष चौधरी देश पाल सिंह कहते हैं, ‘‘कर्ज अदायगी न कर पाने पर सरकार जब किसी की जमीन नीलाम करती है तो इसके बारे में संबंधित व्यक्ति के दरवाजे पर न केवल नोटिस चिपकाया जाता है बल्कि इस बारे में गांव में मुनादी कराई जाती है और अखबारों में इश्तहार भी दिया जाता है. लेकिन चंदन के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं किया गया. चंदन की 21 बीघे यानी करीब चार एकड़ जमीन को महज 90 हजार रूपये में नीलाम कर दिया गया. जबकि उस समय इस जमीन का बाजार भाव 15 लाख रूपये से कहीं ज्यादा था. इस समय तो इस जमीन की कीमत करीब 50 लाख है.’’
चंदन सिंह की माली हालत खराब है. 20 साल पहले बनाए गए दो कमरों के घर में तीन बेटों और बहुओं के साथ चंदन सिंह के परिवार के 11 सदस्य रहते हैं. जब हम चंदन से मिलने पहुंचे थे तो उनकी एक बहू ने बच्चे को जन्म दिया था और वह जगह की कमी की वजह से कडकड़ाती ठंड में उस कमरे में रह रही थी, जहां भैसें रहती थीं. चंदन सिंह कहते हैं, ‘‘जो पैसा खेती और मजदूरी से कमाता हूं वह पिछले 10 सालों से कोर्ट कचहरी और अधिकारियों के चक्कर लगाने में खर्च होते जा रहे हैं.’’ न्याय की मांग को लेकर चंदन सिंह बंजारा पिछले 10 सालों में दर्जनों बार तहसीलदार से लेकर एसडीएम और डीएम के सामने धरना दे चुके हैं. कई बार तो आत्महत्या का भी प्रयास कर चुके हैं. आखिरकार भारतीय किसान यूनियन के लंबें संघर्ष के बाद 4 जनवरी, 2009 को तत्कालीन कमिश्नर आर पी शुक्ल ने सिटी मजिस्ट्रेट अमरनाथ उपाध्याय को आखिरकार इस पूरे मामले की जांच के आदेश दिए. सिटी मजिस्ट्रेट ने अपनी जांच में साफ पाया कि तहसील अधिकारियों अधिकारियों ने चंदन सिंह की बिना जानकारी के और नियम-कानूनों की धजिज्या उड़ाते हुए उसकी जमीन को सस्ते में नीलाम कर दिया. सिटी मजिस्ट्रेट की जांच रिपोर्ट और दूसरे कई दस्तावेज द संडे इंडियन के पास मौजूद है जिससे साबित होता है कि है कि तहसील अधिकारियों और भू माफियाओं ने चंदन सिंह के साथ धोखाधड़ी कर उसकी जमीन को नीलाम करवा दिया. अपनी जांच रिपोर्ट में अमरनाथ उपाध्याय ने साफ लिखा है, ‘‘वसूली मांग पत्र में अंतर्निहित धनराशि 12,384.50 रूपये के सापेक्ष निलाम की गई भूमि का सर्किल मूल्य 1,60,080 रूपये है. इतनी छोटी धनराशि के सापेक्ष इतने बड़े भूखंड को नीलाम किया जाना संदेह की स्थित पैदा करता है. इस छोटी धनराशि की वसूली कुर्क शुदा भूमि पर लगी आवर्ती फसलों की नीलामी से भी की जा सकती थी. पत्रावली के अवलोकन से यह भी स्पष्ट हुआ कि चंदन सिंह की भूमि केवल कागजों में ही कुर्क हुई.’’
सिटी मजिस्ट्रेट की जांच के बाद साफ हो गया कि चंदन सिंह के साथ नाइंसाफी हुई है. इस जांच रिपोर्ट के आधार पर कमिश्नर ने एक आदेश जारी किया कि कर्ज की रकम मय ब्याज सहित जितनी बनती है उसका एक माह में भुगतान कर चंदन सिंह अपनी जमीन को वापस पा सकता है. भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत कहते हैं, ‘‘तत्कालीन कमिश्नर का यह आदेश भी तर्क संगत नहीं था. होना यह चाहिए था कि दोषी अधिकारियों को सजा दी जाती और चंदन सिहं को उसकी जमीन का मालिकाना हक बिना किसी हर्जाने के वापस कर दिया जाता. लेकिन सरकार ने गरीब और निर्दोष चंदन सिंह से कर्ज की राशि 8,464 रूपये के एवज में करीब 60,000 रूपये वसूले. जबकि कर्ज की यह राशि भी वीपी सिंह सरकार ने माफ कर दिया था.’’ वे सवाल करते हुए कहते हैं, ‘‘उत्तर प्रदेश में दलितों की सरकार है. अगर मायावती के राज में अनुसूचित जनजाति के चंदन सिंह बंजारा को न्याय नहीं मिलेगा तो कब मिलेगा. दोषी अधिकारियों को तो जेल होनी चाहिए. लेकिन सजा दिलाने की बजाए अधिकारी उन्हें बचाने में लगे हैं. ’’
चंदन सिंह के कर्ज की मय ब्याज सहित रकम करीब 60 हजार रूपये बनती थी. इसका फौरन भुगतान करना चंदन सिंह के बस की बात नहीं थी. आनन फानन में स्थानीय लोगों ने चंदन सिंह लिए कुछ चंदा इकठ्ठा किया बाकी की रकम चंदन सिंह ने कर्ज लेकर सरकार को अदा की. चंदन सिंह के मित्र और मददगार योगेंद्र सिंह कहते हैं, ‘‘मैने अपनी जमानत पर प्रति माह पांच रूपये सैकडे की दर से शहर के एक व्यापारी से चंदन सिंह को 50,000 रूपये कर्ज दिलवाया है. इसका हर माह का ब्याज हम किसान यूनियन के कुछ लोग मिलकर भर रहे हैं.’’ रकम भरने के बाद भी अधिकारी जमीन चंदन सिंह के नाम करने में हिल्ला हवाली करते रहे. लिहाजा इस बीच जिस ब्यक्ति के नाम चंदन की जमीन है वह इलाहाबाद हाई कोर्ट से स्टे लेकर आया है. खोई जमीन चंदन सिंह के हाथ आते आते फिर रह गई. उधर बिजली के एक लाख रूपये के बिल ने चंदन की मुश्किलें और बढ़ा दी है. अधिकारियों ने कनेक्शन कटने बाद भी चंदन के ट्यूबेल के बिजली का पिछले 10 साल बिल भेज दिया है.
अंगूठा टेक साठ वर्षीय चंदन सिंह बंजारा न तो राष्ट्रपति का नाम जानते हैं और न ही प्रधानमंत्री का. लेकिन वे उनके पद के महत्व को जानते हैं, इसी लिए वे न्याय के लिए कई बार पत्र के जरिए इन लोगों से गुहार लगा चुके हैं. लेकिन 16 साल से इनके यहां से कोई कार्रवाई तो दूर पत्र का जवाब तक नहीं आया है. लिहाजा, न्याय की आस छोड़ झुके चंदन अब हुक्करानों के आगे गिडगिडाने की बजाए, अपना जीवन ही समाप्त कर लेना चाहते हैं. चंदन जैसे गरीब और अनपढ़ किसान की कहानी सत्ता में बैठे लोगों की असंवेदनशीलता की पोल भी खोलती है.
11 लोगों का परिवार चलाना उसके लिए अब मुश्किल हो गया है. उपर से अधिकारियों ने उसे एक लाख रूपये का ट्यूबेल के बिजली का बिल थमा दिया है. लिहाजा, चंदन सिंह अब दर–दर ठोकरें खाने की बजाए अपनी इहलीला ही समाप्त कर देना चाहता है. लेकिन आत्महत्या करना यहां कानूनन जुर्म है. चंदन सिंह बंजारा अधिकारियों के सामने कई बार आत्महत्या का प्रयास कर चुका है. लेकिन हर बार लोगों ने उसे बचा लिया. एक बार जिला मजिस्ट्रेट के सामने आत्महत्या के करने के प्रयास में चंदन सिंह को 14 दिन हवालात में भी बिताने पड़े. जब चंदन ने हवालात से बाहर आने से इनकार कर दिया (चंदन का कहना था कि हवालात में उसे रोटी मिल रही है घर में भूखा रहना पड़ता है.) तो पुलिस उसे जबरन गांव छोड़ गई. लिहाजा, इस बार वह राष्ट्रपति से मय परिवार सामूहिक आत्महत्या की इजाजत देने की गुहार लगा रहा है.
इस कहानी के पात्र हैं पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मुजफ्फरपुर जिले के कैराना तहसील के याहियापुर गांव के रहने वाले अनुसूचित जनजाति के साठ वर्षीय चंदन सिंह बंजारा. 20 साल पहले एक सरकारी घोषणा ने इनके जीवन में जहर घोल दिया है. किसानों के लिए लाभदायी इस घोषणा ने चंदन सिंह को लाभ पहुंचाने की बजाए मौत को गले लगाने के लिए विवश कर दिया है. सरकारी अमले में बैठे भ्रष्ट अधिकारियों ने धोखे से चंदन सिंह बंजारा की जमीन को भूमाफियाओं को बेच दिया. बात सन 1985 की है. ये दिन चंदन सिंह की खुशहाली के दिन थे. तब मेहनतकश इस किसान ने अपने खेतों में ट्यूबेल लगवाने के लिए सरकार से 10 हजार रुपए का कर्ज लिए थे. पांच सालों में उसने कर्ज के करीब 5,700 रुपये वापस कर दिए. इसी दौरान जनता दल की वीपी सिंह सरकार ने किसानों के 10 हजार रुपये तक के कर्ज माफ करने की घोषणा की. इस घोषणा से चंदन सिंह फूले नहीं समाए. चंदन सिंह बंजारा कहते हैं, ‘‘तब एक दिन कुछ सरकारी कर्मचारी मेरे घर आए और बताया कि तुम्हारा कर्जा माफ हो जाएगा, लेकिन इसके लिए तुम्हें हमें दो हजार रुपये देने पड़ेंगे.’’ चंदन सिंह बंजारा के तब इतने पैसे नहीं थे. एक बार उन्होंने सोचा की साहूकार से कर्ज लेकर वह कर्मचारियों को रिश्वत दे दें, लेकिन फिर उन्हें लगा कि जब सरकार ने घोषणा कर दी है तो जब सबका कर्ज माफ होगा तो उनका भी होगा. लेकिन चंदन सिंह ने गलत सोचा था. रिश्वत के भूखे सरकारी बैंक के कारिंदों ने चंदन सिंह का नाम कर्ज माफी की सूची में शामिल नहीं किया. लेकिन इसके बाद जो कुछ हुआ उसने चंदन सिंह की कमर तोड़ दी.
फरवरी, 1992 में उन्हें तहसीलदार के यहां से एक नोटिस मिलता है तो उनके पांव के नीचे से जमीन खिसक जाती है. यह कर्ज की रिकबरी का आदेश था. इस रिकबरी आदेश के मुताबिक चंदन सिंह की बकाया कर्ज राशि मय ब्याज सहित 12,384 रूपये हो चुकी थी और इसे फौरन सरकारी खजाने में जमा करने का आदेश था. चंदन सिंह के पास इतने पैसे नहीं थे. लिहाजा, कर्ज अदायगी न कर पाने के बाद पुलिस चंदन सिंह को पकड़ कर थाने ले गई और उन्हें 14 दिन तक हिरासत में रखा. अंगूठाटेक चंदन सिंह बंजारा भोलेपन से कहते हैं, ‘‘मैं पढ़ा लिखा नहीं हूं, मुझे लगा कि जब मुझे जेल हो गई तो अब मेरा कर्ज माफ हो गया और पैसा नहीं देना पड़ेगा. इसके बाद मुझे कभी रिकबरी का नोटिस भी नहीं आया.’’
इस घटना के करीब तीन साल बाद एक दिन चंदन सिंह बंजारा की जमीन पर कब्जा करने कुछ लोग आते है और उन्हें पता चलता है कि सरकार ने कर्ज अदायगी न कर पाने के एवज में उनकी 21 बीघे जमीन को 19 जुलाई, 1994 को हरबीर सिंह को नीलाम कर दिया है. हैरान परेशान चंदन सिंह भारतीय किसान यूनियन के नेताओं से संपर्क करते हैं. यूनियन और गांव के लोगों ने मिल कर फिलहाल तब जमीन पर कब्जा नहीं होने दिया. इसके बाद भी जब जमीन मालिक चंदन से कब्जा लेते आता गांव और यूनियन के लोग एकजुट होकर उसे गांव से भगा देते. फिलहाल जमीन चंदन सिंह के ही कब्जे में है. बाद में यूनियन के नेताओं की तहकीकात से इस बात का खुलासा हुआ की कैसे तहसीलदार और पटवारी की मिलीभगत से चंदन सिंह की जमीन को गुपचुप तरीके बेच दिया गया. इस मामले को लेकर आंदोलन चलाने वाले भारतीय किसान यूनियन के प्रदेश उपाध्यक्ष चौधरी देश पाल सिंह कहते हैं, ‘‘कर्ज अदायगी न कर पाने पर सरकार जब किसी की जमीन नीलाम करती है तो इसके बारे में संबंधित व्यक्ति के दरवाजे पर न केवल नोटिस चिपकाया जाता है बल्कि इस बारे में गांव में मुनादी कराई जाती है और अखबारों में इश्तहार भी दिया जाता है. लेकिन चंदन के मामले में ऐसा कुछ भी नहीं किया गया. चंदन की 21 बीघे यानी करीब चार एकड़ जमीन को महज 90 हजार रूपये में नीलाम कर दिया गया. जबकि उस समय इस जमीन का बाजार भाव 15 लाख रूपये से कहीं ज्यादा था. इस समय तो इस जमीन की कीमत करीब 50 लाख है.’’
चंदन सिंह की माली हालत खराब है. 20 साल पहले बनाए गए दो कमरों के घर में तीन बेटों और बहुओं के साथ चंदन सिंह के परिवार के 11 सदस्य रहते हैं. जब हम चंदन से मिलने पहुंचे थे तो उनकी एक बहू ने बच्चे को जन्म दिया था और वह जगह की कमी की वजह से कडकड़ाती ठंड में उस कमरे में रह रही थी, जहां भैसें रहती थीं. चंदन सिंह कहते हैं, ‘‘जो पैसा खेती और मजदूरी से कमाता हूं वह पिछले 10 सालों से कोर्ट कचहरी और अधिकारियों के चक्कर लगाने में खर्च होते जा रहे हैं.’’ न्याय की मांग को लेकर चंदन सिंह बंजारा पिछले 10 सालों में दर्जनों बार तहसीलदार से लेकर एसडीएम और डीएम के सामने धरना दे चुके हैं. कई बार तो आत्महत्या का भी प्रयास कर चुके हैं. आखिरकार भारतीय किसान यूनियन के लंबें संघर्ष के बाद 4 जनवरी, 2009 को तत्कालीन कमिश्नर आर पी शुक्ल ने सिटी मजिस्ट्रेट अमरनाथ उपाध्याय को आखिरकार इस पूरे मामले की जांच के आदेश दिए. सिटी मजिस्ट्रेट ने अपनी जांच में साफ पाया कि तहसील अधिकारियों अधिकारियों ने चंदन सिंह की बिना जानकारी के और नियम-कानूनों की धजिज्या उड़ाते हुए उसकी जमीन को सस्ते में नीलाम कर दिया. सिटी मजिस्ट्रेट की जांच रिपोर्ट और दूसरे कई दस्तावेज द संडे इंडियन के पास मौजूद है जिससे साबित होता है कि है कि तहसील अधिकारियों और भू माफियाओं ने चंदन सिंह के साथ धोखाधड़ी कर उसकी जमीन को नीलाम करवा दिया. अपनी जांच रिपोर्ट में अमरनाथ उपाध्याय ने साफ लिखा है, ‘‘वसूली मांग पत्र में अंतर्निहित धनराशि 12,384.50 रूपये के सापेक्ष निलाम की गई भूमि का सर्किल मूल्य 1,60,080 रूपये है. इतनी छोटी धनराशि के सापेक्ष इतने बड़े भूखंड को नीलाम किया जाना संदेह की स्थित पैदा करता है. इस छोटी धनराशि की वसूली कुर्क शुदा भूमि पर लगी आवर्ती फसलों की नीलामी से भी की जा सकती थी. पत्रावली के अवलोकन से यह भी स्पष्ट हुआ कि चंदन सिंह की भूमि केवल कागजों में ही कुर्क हुई.’’
सिटी मजिस्ट्रेट की जांच के बाद साफ हो गया कि चंदन सिंह के साथ नाइंसाफी हुई है. इस जांच रिपोर्ट के आधार पर कमिश्नर ने एक आदेश जारी किया कि कर्ज की रकम मय ब्याज सहित जितनी बनती है उसका एक माह में भुगतान कर चंदन सिंह अपनी जमीन को वापस पा सकता है. भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत कहते हैं, ‘‘तत्कालीन कमिश्नर का यह आदेश भी तर्क संगत नहीं था. होना यह चाहिए था कि दोषी अधिकारियों को सजा दी जाती और चंदन सिहं को उसकी जमीन का मालिकाना हक बिना किसी हर्जाने के वापस कर दिया जाता. लेकिन सरकार ने गरीब और निर्दोष चंदन सिंह से कर्ज की राशि 8,464 रूपये के एवज में करीब 60,000 रूपये वसूले. जबकि कर्ज की यह राशि भी वीपी सिंह सरकार ने माफ कर दिया था.’’ वे सवाल करते हुए कहते हैं, ‘‘उत्तर प्रदेश में दलितों की सरकार है. अगर मायावती के राज में अनुसूचित जनजाति के चंदन सिंह बंजारा को न्याय नहीं मिलेगा तो कब मिलेगा. दोषी अधिकारियों को तो जेल होनी चाहिए. लेकिन सजा दिलाने की बजाए अधिकारी उन्हें बचाने में लगे हैं. ’’
चंदन सिंह के कर्ज की मय ब्याज सहित रकम करीब 60 हजार रूपये बनती थी. इसका फौरन भुगतान करना चंदन सिंह के बस की बात नहीं थी. आनन फानन में स्थानीय लोगों ने चंदन सिंह लिए कुछ चंदा इकठ्ठा किया बाकी की रकम चंदन सिंह ने कर्ज लेकर सरकार को अदा की. चंदन सिंह के मित्र और मददगार योगेंद्र सिंह कहते हैं, ‘‘मैने अपनी जमानत पर प्रति माह पांच रूपये सैकडे की दर से शहर के एक व्यापारी से चंदन सिंह को 50,000 रूपये कर्ज दिलवाया है. इसका हर माह का ब्याज हम किसान यूनियन के कुछ लोग मिलकर भर रहे हैं.’’ रकम भरने के बाद भी अधिकारी जमीन चंदन सिंह के नाम करने में हिल्ला हवाली करते रहे. लिहाजा इस बीच जिस ब्यक्ति के नाम चंदन की जमीन है वह इलाहाबाद हाई कोर्ट से स्टे लेकर आया है. खोई जमीन चंदन सिंह के हाथ आते आते फिर रह गई. उधर बिजली के एक लाख रूपये के बिल ने चंदन की मुश्किलें और बढ़ा दी है. अधिकारियों ने कनेक्शन कटने बाद भी चंदन के ट्यूबेल के बिजली का पिछले 10 साल बिल भेज दिया है.
अंगूठा टेक साठ वर्षीय चंदन सिंह बंजारा न तो राष्ट्रपति का नाम जानते हैं और न ही प्रधानमंत्री का. लेकिन वे उनके पद के महत्व को जानते हैं, इसी लिए वे न्याय के लिए कई बार पत्र के जरिए इन लोगों से गुहार लगा चुके हैं. लेकिन 16 साल से इनके यहां से कोई कार्रवाई तो दूर पत्र का जवाब तक नहीं आया है. लिहाजा, न्याय की आस छोड़ झुके चंदन अब हुक्करानों के आगे गिडगिडाने की बजाए, अपना जीवन ही समाप्त कर लेना चाहते हैं. चंदन जैसे गरीब और अनपढ़ किसान की कहानी सत्ता में बैठे लोगों की असंवेदनशीलता की पोल भी खोलती है.
Monday, January 25, 2010
Friday, January 22, 2010
[bku] 1 Farmer suicide every 30 minutes in Indi
Nearly 2 lakh farm suicides since 1997
P. Sainath
Over two-thirds in ‘suicide belt’ of five States, more than one-fifth in Maharashtra
MUMBAI: There were at least 16,196 farmers’ suicides in India in 2008, bringing the total since 1997 to 199,132, according to the National Crime Records Bureau (NCRB).
The share of the Big 5 States or ‘suicide belt’ in 2008 — Maharashtra, Andhra Pradesh, Karnataka, Madhya Pradesh, and Chhattisgarh — remained very high at 10,797, or 66.6 per cent of the total farm suicides in the country. This was marginally higher than it was in 2007 (66.2 per cent). Maharashtra remains the worst State in the nation for farm suicides with a total of 3802. (This is just 40 short of the combined total of Andhra Pradesh and Karnataka.) The all-India total of 16,196 represents a fall of 436 from 2007. But the broad trends of the past decade reflect no significant change. The national average for farm suicides since 2003 stays at roughly one every 30 minutes.
Within the Big 5, Andhra Pradesh, Madhya Pradesh, and Chhattisgarh recorded higher numbers. The increase of 604 in these three States somewhat offset the dip in Maharashtra (436) and Karnataka (398). But a fall in suicide numbers in other States (for example, a decline of 412 in Kerala and 343 in West Bengal) means that the Big 5 marginally increased their two-thirds share of total farm suicides in 2008.
The NCRB data now cover all States for 12 years from 1997. In the first six years (1997-2002), the Big 5 witnessed 55,769 farmers’ suicides. From 2003 to 2008, they totalled 67,054, a rise of nearly 1900 a year on average.
Maharashtra has logged 41,404 farm suicides from 1997 (over a fifth of the national total) and 44,468 from 1995, the year when this State began recording farm data. No other State comes close. During 1997-2002, Maharashtra saw, on average, eight farmers kill themselves daily. The corresponding figure rose to 11 during 2003-2008. The rise was from an average of 2,833 farm suicides a year in the first period to an average of 4,067 in the next period.
Professor K. Nagaraj, an economist who has worked at the Madras Institute of Development Studies, says of the NCRB data: “There is hardly any decline in the suicide belt, though individual States may show variations across 12 years. If this is the state for 2008, the year of the Rs. 70,000 crore loan waiver and multiple farm packages, then 2009, a drought year, could show very disturbing figures. The underlying agrarian problems seem as acute as ever.”
P. Sainath
Over two-thirds in ‘suicide belt’ of five States, more than one-fifth in Maharashtra
MUMBAI: There were at least 16,196 farmers’ suicides in India in 2008, bringing the total since 1997 to 199,132, according to the National Crime Records Bureau (NCRB).
The share of the Big 5 States or ‘suicide belt’ in 2008 — Maharashtra, Andhra Pradesh, Karnataka, Madhya Pradesh, and Chhattisgarh — remained very high at 10,797, or 66.6 per cent of the total farm suicides in the country. This was marginally higher than it was in 2007 (66.2 per cent). Maharashtra remains the worst State in the nation for farm suicides with a total of 3802. (This is just 40 short of the combined total of Andhra Pradesh and Karnataka.) The all-India total of 16,196 represents a fall of 436 from 2007. But the broad trends of the past decade reflect no significant change. The national average for farm suicides since 2003 stays at roughly one every 30 minutes.
Within the Big 5, Andhra Pradesh, Madhya Pradesh, and Chhattisgarh recorded higher numbers. The increase of 604 in these three States somewhat offset the dip in Maharashtra (436) and Karnataka (398). But a fall in suicide numbers in other States (for example, a decline of 412 in Kerala and 343 in West Bengal) means that the Big 5 marginally increased their two-thirds share of total farm suicides in 2008.
The NCRB data now cover all States for 12 years from 1997. In the first six years (1997-2002), the Big 5 witnessed 55,769 farmers’ suicides. From 2003 to 2008, they totalled 67,054, a rise of nearly 1900 a year on average.
Maharashtra has logged 41,404 farm suicides from 1997 (over a fifth of the national total) and 44,468 from 1995, the year when this State began recording farm data. No other State comes close. During 1997-2002, Maharashtra saw, on average, eight farmers kill themselves daily. The corresponding figure rose to 11 during 2003-2008. The rise was from an average of 2,833 farm suicides a year in the first period to an average of 4,067 in the next period.
Professor K. Nagaraj, an economist who has worked at the Madras Institute of Development Studies, says of the NCRB data: “There is hardly any decline in the suicide belt, though individual States may show variations across 12 years. If this is the state for 2008, the year of the Rs. 70,000 crore loan waiver and multiple farm packages, then 2009, a drought year, could show very disturbing figures. The underlying agrarian problems seem as acute as ever.”
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