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Monday, June 8, 2015

Bhartiya kisan union feedback to joint committee of parliament on the land acquisition amendments bill 2015






अध्यक्ष/सदस्य
संयुक्त संसदीय समिति भूमि अधिग्रहण बिल 2015
लोकसभा सचिवालय कमरा न0 306 तीसरा फ्लोर
संसद भवन एनेक्सी नई दिल्ली।


विषयः- भूमि अधिग्र्रहण बिल 2015 पर भारतीय किसान यूनियन की आपत्ति और सुझाव।

आदरणीय अध्यक्ष/सदस्य

भूमि अधिग्रहण बिल, 2015 को सरकार ने देश के हर कोने से उठ रही विरोधी आवाज व् आन्दोलन को देखते हुए संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया है | 1894 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम के अंतर्गत जबरनअनुचित और अन्यायपूर्ण तरीके से जमीन अधिग्रहण के अनुभवों के आधार परविविध किसान संगठनों के लम्बे संघर्ष के बाद भूमि अधिग्रहणपुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 में समुचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार संसद द्वारा अधिनियमित किया गया था । एक दशक तक चले अभूतपूर्व देशव्यापी परामर्शसंसद में और बीजेपी के नेतृत्व वाली दो स्थायी समितियों में बड़े पैमाने पर बहस के बाद ही 2013 का यह भूमि अधिग्रहण अधिनियम बनाउस वक्त वर्तमान लोकसभा सभापति और स्थायी समिति की अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के साथ बीजेपी ने भी तहेदिल से अधिनियम के समर्थन में थीऔर खुलकर इस कानून के प्रावधानों का समर्थन कर रही थी |

हम मानते हैं की 2015 का भूमि अध्यादेश / अधिनियम पूरी तरह सेसमुचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार भूमि अधिग्रहणपुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013, का और अन्यायपूर्ण भूमि अधिग्रहण के खिलाफ सालों के संघर्ष का मजाक है ।
इस अधिनियम के प्रावधान किसानों की बिना अनुमति के उसकी ज़मीन छीनकर कम्पनियों को दे देंगे और दूसरी तरफ बहु फसली ज़मीन या फिर ज़रुरत से ज्यादा ज़मीन का अधिग्रहण भी social impact assessment के प्रावधान को हटाने के कारण लागू हो जाएगा | 

सरकार ने अध्यादेश में जो संशोधन भी लायें है वह सिर्फ कागजी ही दिखता है क्योंकि वह मूल रूप से २०१३ के कानून के मूल उद्देश्यों को खारिज करता है. खेती की ज़मीन का हस्तांतरण, खाद्य सुरक्षा की अनदेखी, लोगों की जीविका, जबरदस्ती भूमि अधिग्रहण पर रोक, अधिग्रहित भूमि को किसानों को वापसी आदि जैसे मुद्दों को २०१३ का कानून कुछ हद्द तक सम्बोधित करता था, पर वह भी ख़तम कर दिया गया है |

यह सरकार भी जानती है कि जमीनें पीढ़ी दर पीढ़ी आजीविका मुहैय्या कराती हैं और मुआवजा कभी भी वैकल्पिक आजीविका नही दे सकते हैं ! यह सभी जानते हैं कि जब भारत में कृषि योग्य ज़मीनें व किसान नही बचेंगें तो देश की खाद्य संप्रभुता समाप्त हो जायेगी और देश खाद्य के मामले ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देशों पर निर्भर हो जाएगा ,तथा साथ साथ ज़मीन से जुड़े हुए भूमिहीन किसान और खेत मज़दू णर तथा ग्रामीर, दस्तकार ,छोटे व्यापारी देश के नक़्शे से ही गायब हो जायेंगे। उसके बाबजूद भी जमीनों के चार गुना मुआवजा देकर अधिग्रहण की बात कर रही सरकार अपने आप को किसानो का सबसे बड़ा हितैषी बता रहे हैं, जबकि सच्चाई तो यह है कि भाजपा शासित राज्यों की सरकारे अति उपजाऊ ज़मीन का भी मुआवजा मात्र दो से ढाई गुना पर निपटा रही हैं |  

समिति के  सामने भारतीय किसान यूनियन  कुछ सुझाव रखना चाहती  हैं और बतलाना चाहते हैं की सरकारी संशोधन सिर्फ दिखावे हैं, आज जरूरत है की कृषि संकट को दूर किया जाए और खेती एक जीविका का उत्तम साधन बन सके लोगों के लिए |






संशोधन
 मूल अधिनियम
1.     
अध्यादेश में  परियोजनाओं की एक विशेष श्रेणी (नया सेक्शन 10अ) बनाई गई है जिसमें सहमति लेने, सामाजिक प्रभाव आंकलन की जरुरत, विशेषज्ञ समूह से  समीक्षा कराने, बहुफसलीय/ खेती की जमीन लेने की  छूट है.  

इस विशेष श्रेणी के पांच विषय/आइटम हैं: औद्योगिक गलियारे  और आधारभूत सुविधाओं वाली परियोजनाएं जिनमें पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप की परियोजनाएं शामिल हैं. अधिकांश अधिग्रहण इन्हीं दो श्रेणियों के अंतर्गत होने का असर यह होगा कि 2013 के मूल कानून के सुरक्षा उपाय पूरी तरह ख़त्म  हो जायेंगे.

‘सोशियल इन्फ्रास्ट्रक्चर’ को इस नई श्रेणी में शामिल किया गया था और बाद में सरकार द्वारा ही इसे वापस ले लिया गया.
2013 के कानून में इस तरह का कोई क्लॉज़ नहीं था. ये सभी गतिविधियाँ अध्याय 2 और 3 के लिए निर्धारित  प्रक्रिया को पूरा करने के लिए आवश्यक थीं.

सेक्शन 2(2) में परियोजना की मंजूरी हेतु (70-80%) प्रभावित परिवारों से सहमति लेना आवश्यक था.

एक नया प्रावधान जोड़ दिया गया है इससे सेक्शन 10अ से उन सभी निर्धारित गतिविधियों को हटा दिया गया है जो  सहमति के दायरे में आती थीं.
2.     
10अ की नई श्रेणी में बचाव के नए सेक्शन जोडे गए हैं:  अध्यादेश के जरिये नये सेक्शन में दो नए प्रावधान सरकार ने जोड़े.

मूलतः इसके जरिये सरकार यह सुनिश्चित करने की कोशिश करती है कि परियोजना के लिए ली जाने वाली जमीन के लिए कम से कम सवालात हों. दूसरा प्रावधान सरकार को बंजर जमीन का सर्वेक्षण करने का आदेश देता है

2013 के कानून में मौजूद सामाजिक प्रभाव आंकलन को  असावधानी से  जोड़ा गया है.

परियोजनाओं को सामाजिक प्रभाव आंकलन प्रक्रिया के दायरे से बाहर रखने के लिए सरकार सामाजिक प्रभाव आंकलन की निर्धारित छह शर्तों में से एक शर्त को ही शामिल किया.     

सामाजिक प्रभाव आंकलन को लागु करने की बजाय सरकार ने उसके प्रति उठने वाली चिंताओं को दबाने के लिए इसे सूक्ष्म और तुच्छ बना दिया.
3.     
पहले के क्लॉज़ में महत्वपूर्ण संशोधन सेक्शन 24(2) शामिल किया गया. सेक्शन में संशोधन करके मुकदमेबाजी के समय को बाहर रखा गया जहाँ स्थगन आदेश की अवधि को पूरा करना आवेदक के लिए जरूरी हो.

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित मुआवजे की परिभाषा को अमान्य घोषित कर दिया गया.

2013 का कानून सेक्शन 24(2) जमीन पे सीधा कब्जा न होने या मुआवजा न दिए जाने की स्थिति में जमीन वापस लौटाने की अनुमति देता है.

अब आवेदकों के लिए नई आवश्यकताओं को पूरा करना और भी मुश्किल कर दिया गया.

कानून यह बताता कि देय मुआवजे का क्या आशय है इसे अदालतों पर छोड़ दिया गया. सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुआवजे से आशय है कोर्ट में या सीधा लाभार्थी के खाते में पैसे जमा करना.  
4.     
नियमों का उल्लंघन करने वाले अधिकारीयों के खिलाफ कार्यवाही मंजूरी के बाद ही हो सकेगी. नए संशोधन में आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के तहत सरकार से अनुमति मिलने के बाद ही कार्यवाही हो सकेगी.

2013 कानून की धारा 87 में अधिकारीयों को कानून को लागू करने के लिए ज्यादा जवाबदेह बनाया गया  और उल्लंघन किये जाने की स्थिति में दंड का प्रावधान भी है. किसी प्राधिकरण से पूर्व अनुमति लेने की जरुरत नहीं है.

5.     
उपयोग न हुई जमीन को लौटाने के प्रावधान को कमजोर किया गया.  अध्यादेश में संशोधन करके पांच साल की अवधि को खत्म करके ‘परियोजना की स्थापना की निर्धारित अवधि या पांच साल जो भी बाद में हो’ को किया गया.
2013 के कानून की धारा 101 में पांच साल तक जमीन का इस्तेमाल न होने पर वापस करने (जमीन के मालिक को या राज्य भूमि बैंक) की बात कही गयी.
6.     
सरकार को दो से पांच साल में कानून लागू करने का विशेष अधिकार. इससे कानून की व्याख्या करने के लिए जरुरी किसी भी कदम को सरकार ले सकती है.   
2013 के कानून की धारा 113 में सरकार कानून पास होने के दो साल के बाद उसे लागू करने के लिए आवश्यक कोई भी कदम ले सकती है.
7.     
निजी संस्था’ की परिभाषा को विस्तारित किया गया ताकि स्वामित्व, साझेदारी, गैर-लाभ का संगठन या कोई अन्य संस्था को शामिल किया जा सके. इसका मतलब है कि ये संस्थाएं सरकार से सार्वजानिक उद्देश्य के लिए जमीन अधिग्रहित करने के लिए अनुरोध कर सकती हैं. 

2013 का कानून या तो सरकारी संस्थाओं या सरकार के जरिये निजी कम्पनियों के लिए ही जमीन के अधिग्रहण की इजाजत देता है. अधिग्रहण का मतलब यह बिलकुल भी नहीं कि किसी भी संस्था के लिए निर्दयतापूर्वक जमीन ली जाये.
8.     
औद्योगिक गलियारों का विस्तार: सरकार ने औद्योगिक गलियारे के विस्तार की परिभाषा में नया संशोधन किया है अब औद्योगिक गलियारे में सड़क या रेलवे लाईन के एक या दोनों तरफ एक एक किलोमीटर जमीन लेने की बात कही गयी है   
 यह परियोजना गतिविधियों के वृहद विस्तार है जो अध्यादेश के जरिये पहले ही सरकार पेशा कर चुकी है.

सामाजिक प्रभाव आंकलन का भी यह उल्लंघन है जिसमें परियोजना के लिए कम से कम जमीन के विस्तार की बात कही गयी .

इसका बेहतरीन उदाहरण है यमुना एक्सप्रेस-वे, जिसमें एक्सप्रेस-वे परियोजना  के किसी भी तरफ अतिरिक्त जमीन  ली गई और बाद में उसे उत्तर प्रदेश में जेपी ग्रुप को दे दिया गया.
9.     
खेतिहर मजदूर के लिए अनिवार्य रोजगार . एक नया सेक्शन डालकर खेतिहर मजदूर के लिए रोजगार अनिवार्य किया गया.
यह संशोधन गुमराह करने वाला, सतही और एकपक्षीय है. 2013 का कानून दूसरी अनुसूची के आइटम 4 के तहत अनिवार्य रोजगार देता है.

वास्तव में यह और अन्य लाभ, बड़ी संख्या में भूमिहीनों को दिए जाते जिनकी आजीविका प्रभावित होगी न कि सिर्फ खेतिहर मजदूर को (जिन्हें प्रभावित परिवार की श्रेणी में रखा गया ). 

यह संशोधन संविधान की धारा 14 का उल्लंघन है क्योंकि यह  स्पष्ट किये बिना एक अलग तरह की प्रजाति बनाता है.
10.  
नया सेक्शन 67: अर्धन्यायिक प्राधिकरण अब भूमि अधिग्रहण पुनर्वास और पुनर्वसन प्राधिकरण के रूप में  जाना जायेगा जो उस जिले में सुनवाई करेगा, जहाँ अधिग्रहण किया जा रहा हो.

इस संशोधन की जरूरत नहीं थी क्योंकि एलएआरआर प्राधिकरण एक स्वतंत्र निकाय है जो स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकता है.

हालाँकि, वास्तविक रूप में यह एलएआरआर प्राधिकरण की संरचना या कार्यों में कमी नहीं कर सका.


भारतीय किसान यूनियन आशा करती है कि समिति को दिए गए सुझावों पर गंभीरता से चिंतन करते हुए अपनी राय में शामिल कर सरकार को देगी |  |   
                                            भवदीय   
चौ.नरेश टिकैत                                                      चौ युधवीर सिंह   
(राष्ट्रीय अध्यक्ष )                                               (राष्ट्रीय महासचिव )



Friday, March 20, 2015

प्रेस नोट भाकियू के धरने के तीसरे दिन भी संसद मार्ग पर डटे हजारों किसान, आम आदमी पार्टी के सांसद गुरसेवक सिंह ने धरने पर पहुंचकर कहा कि किसानों की आवाज संसद में उठाऊंगाः भाकियू


प्रेस नोट
भाकियू के धरने के तीसरे दिन भी संसद मार्ग पर डटे हजारों किसान, आम आदमी पार्टी के सांसद गुरसेवक सिंह ने धरने पर पहुंचकर कहा कि किसानों की आवाज संसद में उठाऊंगाः भाकियू
भाकियू ने प्रधानमंत्री को पत्र लिखकर कहा कि भूमि अधिग्रहण बिल 2015 पर खुुली बहस के लिए तैयारः चै. टिकैत
आज दिनांक 20 मार्च 2015 को भारतीय किसान यूनियन का दिल्ली में संसद मार्ग पर जारी है। किसानों ने मंच के माध्यम से अपने दर्द को रखा। धरने के तीसरे दिन भी किसान बिना किसी सुविध के संसद मार्ग पर जमे है। सरकार द्वारा आवश्यक इंतजाम न किये जाने का दर्द भी किसानों को है। आज आम आदमी पार्टी के सांसद गुरसेवक सिंह ने कहा कि देश की सरकारों ने अन्नदाता के साथ कभी न्याय नहीं किया। यहां पर आये किसानों की बात को मैं देश की संसद में पहुंचाने का कार्य करूगा। आम आदमी पार्टी देश के किसानों के साथ है।
भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष चै. नरेश टिकैत व अखिल भारतीय किसान आन्दोलन की समन्वय समिति के समन्वयक चै. युद्धवीर सिंह ने माननीय प्रधानमंत्री जी को संयुक्त पत्र लिखकर भूमि अधिग्रहण बिल 2015 पर खुली बहस कराये जाने हेतु निमन्त्रण दिया। अखिल भारतीय कांग्रेस कमैटी उत्तर प्रदेश की तरफ से नसीब पठान सदस्य विधान परिषद ने भी किसानों के बीच पहुंचकर अपना समर्थन दिया।
धरने को राजपाल शर्मा राष्ट्रीय महासचिव, विरेन्द्र डागर दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष, जगदीश सिंह, हरनाम सिंह वर्मा, राजा रिगा तमिल नाडु फार्मर एसोसिशएशन, के.टी. गंगाधर, सहित कई किसान नेताओं ने सम्बोधित किया।

माननीय,
श्री नरेन्द्र मोदी जी,
प्रधानमंत्री भारत सरकार,
7, रेस क्राॅस रोड, नई दिल्ली।
विषयः- राजग सरकार को भूमि अधिग्रहण बिल 2015 पर बहस हेतु खुला निमन्त्रण।
आदरणीय श्री मोदी जी,
समाचार पत्रों के माध्यम से ज्ञात हुआ है कि आपकी सरकार द्वारा कुछ राजनीतिक दल के नेताओं को भूमि अधिग्रहण बिल 2015 पर खुली बहस हेतु निमन्त्रण दिया है।
भूमि अधिग्रहण बिल का मसौदा देश के किसानों के लिए बहुत चिंता का विषय है। हम किसानों के लिए बहुत आवश्यक है कि इसकी अच्छाई और बुराई पर बहस होनी चाहिए।
हम किसान संगठन के लोग इस विषय पर आपकी सरकार व सरकार के प्रतिनिधियों से खुली बहस के तैयार है।
हमारा आपसे निवेदन है कि आप इस विषय पर किसानों के साथ खुली चर्चा के लिए सरकार की तरफ से प्रतिनिधि नियुक्त किये जाने का कष्ट करें। इस विषय पर चर्चा हेतु सरकार सुविधानुसार समय और जगह का चुनाव कर भारतीय किसान यूनियन के प्रतिनिधियों को अवगत कराने का कष्ट करें। क्योंकि यह भविष्य में किसानों की आजीविका से जुडा सवाल है।
देशभर से पिछले तीन दिनों से 20 हजार से अधिक किसान भूमि अधिग्रहण बिल व खेती किसानी से जुडे़ मुद्दों को लेकर संसद मार्ग पर धरनारत है। किसानों को केवल इस बात का इंतजार है कि क्या देश के प्रधानमंत्री किसानों से चाय पर चर्चा या मन की बात करने के इच्छुक है, या नहीं।
देश के विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधि भूमि अधिग्रहण बिल 2015 पर चर्चा के लिए तैयार है।
आशा है कि आपके द्वारा जल्द से जल्द इस विषय पर किसानों से चर्चा की जाएगी।
भवदीय

चै. नरेश टिकैत चै. युद्धवीर सिंह
(राष्ट्रीय अध्यक्ष भाकियू)  समन्वयक
 (अखिल भारतीय किसान आन्दोलन समन्वय समिति)

                                                                      भवदीय

   चै. राकेश टिकैत
( राष्ट्रीय प्रवक्ता भाकियू  )




Monday, January 5, 2015

भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को रदद कराने के लिए भाकियू करेगी देशव्यापी आन्दोलन, उत्तर प्रदेश के सभी मुख्यालयों पर सात जनवरी को भाकियू करेगी प्रदर्शन: भाकियू

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भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को रदद कराने के लिए भाकियू करेगी देशव्यापी आन्दोलन, उत्तर प्रदेश के सभी मुख्यालयों पर सात जनवरी को भाकियू करेगी प्रदर्शन: भाकियू
किसानों की जोर-जबरदस्ती से जमीन छीनने का कानून है नया भूमि अध्यादेश: राकेश टिकैत
मोदी सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण के सम्बंध में लाए गए अध्यादेश से स्पष्ट है कि कार्पोरेट को किसानों की लूट को छूट देने वाला अध्यादेश है। भारतीय किसान यूनियन भारत सरकार से इस अध्यादेश को तत्काल वापिस लेने की मांग करती है। सरकार ने उचित मुआवजे का अधिकार एवं पुनस्र्थापना अधिनियम 2013 में किसानों के पक्ष के सभी प्रावधानों को संशोधित कर, वर्तमान कानून को 1894 के अंगे्रजी कानून से भी बदत्तर बना दिया है।
देश के विभिन्न राज्यों में भूमि अधिग्रहण के विरोध में विभिन्न हिंसक आन्दोलन और सैकड़ों किसानों की जान की कुर्बानी के दबाव के चलते दो साल तक व्यापक बहस के बाद भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव किया गया था। कई राज्यों में भूमि अधिग्रहण के आन्दोलन से सरकार भी बदल गई थी। भूमि अधिग्रहण कानून 1894  के बल पर किसानों की जमीनें सस्ते में खरीद कर उद्योगपतियों को देने की मान्यता देता था।
भारतीय किसान यूनियन ने कई बडे आन्दोलन कर पुराने भूमि अधिग्रण बिल को रद्द कराने में अहम भूमिका निभाई थी। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता चैधरी राकेश टिकैत के नेतृत्व में संसद की स्थाई समिति के समक्ष देश के किसानों का पक्ष रखते हुए अपनी बात मनवाने में सफलता हासिल की थी।
भारत सरकार द्वारा लाये गए अध्यादेश में पीपीपी प्रोजेक्ट के लिए 70 प्रतिशत तथा निजी कम्पनियों के लिए 80 प्रतिशत प्रभावित किसानों की सहमति की अनिवार्यता के प्रावधान को समाप्त किया जाना, सामाजिक प्रभाव अध्ययन की अनिवार्यता न्यूनतम बहुफसली खेती की जमीन के अधिग्रहण करने के प्रावधान को समाप्त करने तथा धारा 24(2) में पांच वर्ष की समय सीमा समाप्त करने से विकास के नाम पर जमीन की लूट को कानूनन मान्यता दे दी गई है। पांच वर्ष के अंदर अगर अधिग्रहित भूमि का उपयोग नहीं होता है। तो उसे मूल मालिक को लौटाने का प्रावधान भी समाप्त कर दिया गया है। अब बिना उपयोग किये हुए भी भूमि लम्बे समय तक उद्योगपति अपने पास रख सकते है। (सेक्शन 101 में संशोधन) सरकार ने खुद को नये कानून को लागू करने में पैदा होने वाली किसी भी कठिनाई को हटाने के लिए नोटीफिकेशन जारी करने की समय सीमा को दो से बढ़ाकर 5 साल कर लिया गया है ताकि किसानों की जमीन की लूट आसान बनी रहे। मोदी सरकार के गठन के बाद से ही  किसानों में सरकार की तरफ से की जा रही है, बयानबाजी से यह आशंका बनी हुई थी कि सरकार द्वारा अब तक बने जनहितेषी कानूनों में बदलाव किया जाएगा, जो सच साबित हुई।
भारतीय किसान यूनियन भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को रद्द कराने हेतु देशव्यापी आन्दोलन की शुरूआत 7 जनवरी 2015 से उत्तर प्रदेश के जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन कर अपना विरोध दर्ज कराएगी। भारतीय किसान यूनियन के वार्षिक राष्ट्रीय अधिवेशन 16 से 18 जनवरी 2015 तक इलाहाबाद में किया जाएगा। जिसमें भारतीय किसान यूनियन भूमि अधिग्रहण बिल, फसलांे का लाभकारी मूल्य, देश में राॅ शुगर के आयात पर प्रतिबंध व विश्व व्यापार संगठन के विरोध में आन्दोलन की बडी रणनीति की घोषणा करेगी।
     भवदीय

  चैधरी राकेश टिकैत
   (राष्ट्रीय प्रवक्ता भाकियू)

Tuesday, March 19, 2013

PRESS RELEASE
जल-जंगल-बीज-जमीन हो किसानों के अधीन: महापंचायत के अंतर्गत लाखो की संख्या में देश के किसान अपनी मांगो के साथ संसद मार्ग पर दूसरे दिन भी जमे हैं.
नयी दिल्ली, मार्च 19, 2013: किसान महापंचायत के दूसरे दिन भी आज संसद मार्ग पार लाखों की संख्या में देश के किसान अपनी मांगो के साथ डटे हुए हैं. साथ हीं साथ महापंचायत में भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत ने घोषणा की है कि जब तक सरकार किसानों की मांगो को पूरी तरह से मान्य नहीं करती तब तक किसान यहाँ से नहीं उठेंगे.
विदित हो कि भारतीय किसान आन्दोलन समन्वयक समिति के तत्वाधान में भारतीय किसान यूनियन, कर्नाटक राज्य रायतु संघ, एन ए पी एम, राष्ट्रीय किसान स्वराज आशा गठबन्धन के साथ साथ पंजाब, हरियाणा, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, कर्नाटक, तमिलनाड, आंध्र प्रदेश, मध्य प्रदेश एवं केरल के किसान लाखों की संख्या में कल दिनांक 18.03.2013 को स्थानीय संसद मार्ग पार आयोजित किसान महापंचायत में अपनी मांगो के शामिल हुए. कल मुख्यतः भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष नरेश टिकैत, राष्ट्रीय प्रवक्ता राकेश टिकैत, मेधा पाटेकर, कविता कुरुगंती, स्वामी अग्निवेश, युधवीर सिंह, अजमेर सिंह लोखोवाल, चुक्की नन्जुन्दस्वामी, चेल्लुमुथू, पंकज भूषण के साथ साथ कई किसान नेताओं ने महापंचायत को संबोधित किया. और कल शाम तक सरकार ने जब सुध नहीं ली तब यह महापंचायत विशाल धरने में परिवर्तित हो गया, जिस कारण लगभग एक लाख किसान सारी रात संसद मार्ग पार सोए रहे.
चौधरी राकेश टिकैत के आह्वान पार आज पुनः लाखों की संख्या में किसान अपने अपने गाँवों से इस् धरने में शामिल होने चल पड़े है ताकि सरकार तक किसानों की मांगों को पहुंचाई जा सके और सरकार अन्न दाताओं की बात मान सके.
किसान नेता युधवीर सिंह ने कहा कि सरकार की किसान विरोधी नीतियों को समाप्त होना चाहिए और खाशकर भूमि अधिग्रहण बिल में संसोधन, किसानों की आय की सुरक्षा, किसानों को उत्पादन का लाभकारी मूल्य आदि पार केंद्र सरकार को अविलम्ब सुनवाई करते हुए हल नोकालना चाहिए.
राष्ट्रीय अद्ध्यक्ष नरेश टिकैत ने कहा कि हम किसान अन्न दाता हैं और पूरे राष्ट्र को खिलते हैं पार सरकार हमारी मांगो को बार बार अनदेखी कर रही है. अब हम अपनी मांगो को पूरी करवाए बगैर यहाँ से नहीं हटेंगे.
राष्ट्रीय किसान स्वराज आशा गठबन्धन के राष्ट्रीय सह संयोजक पंकज भूषण ने कहा कि सरकार तो बहुराष्ट्रीय कंपनियों के इशारे पार चल रही और उसे इन अन्न दाताओं को सुनने की फुर्सत कहाँ है. साथ ही उन्होंने ने आहवान किया कि सरकार अविलम्ब किसानों की बात मने और संसदीय कृषि समिति के परिवेदन पार अमल करते हुए देश भर में जी एम बीजों का प्रचार प्रसार बंद कर दे.
किसानों की मुख्य मांगे हैं:
  1. किसानों के आय की सुरक्षा.
  2. भूमि अधिग्रहण बिल में आवश्यक संशोधन.
  3. खुला व्यापार समझौता रद्द हो.
  4. देश में जी एम बीजों का परीक्षण बंद हो. परंपरागत खेती, जैविक खेती पार बाल दिया जाये.
  5. किसान आय आयोग बनाये जाएँ आदि.

किसानों को स्वामी अग्निवेश, चुक्की, कन्नयन एवं कविता कुरुगंती ने भी संबोधित किया.
किसानों का कहना यह ही है की दो वर्ष पहले सरकार ने कई वादे हमसे किया लेकिन अद्द्यतन वो पूरे नहीं हुए. इस् बार हम बिना प्रधान मंत्री से मिले नहीं हटेंगे चाहे जो हो जाये. क्योंकि सरकार गूंगी और बहरी भी है. जल्द यदि सरकार नहीं सुनेगी तब हमारे ट्रेक्टर गांव से चलकर दिल्ली को जाम करेंगे और तब हीं सरकार के कानों तक बात जा पाए. धरने में हजारों की संख्या में महिलाओं ने भी शिरकत किया हुआ है.
धरने की अध्यक्षता अजमेर सिंह गिल ने की. अन्य वक्ताओं में मुख्यतः अजमेर सिंह लाखोवाल, गुरुनाम सिंह, बलराम लम्बरदार, दीवान चंद्र चौधरी, जगदीश सिंह, शैला मुथु, विजय वर्गी आदि ने की.

For more information, contact: Dharmendar Kumar: 9219691168; Kannaiyan: 9444989543; Ashlesha: 9900200771.