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Friday, August 4, 2017

Ch. Naresh Tikait meet CM Yogi adityanath


भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय अध्यक्ष चौ0 नरेश टिकैत जी के नेतृत्व में भाकियू के प्रतिनिधिमंडल ने उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री श्री योगी आदित्यनाथ के आवास 5 कालिदास मार्ग पर भेंट कर किसानों की समस्याओं पर चर्चा कर समाधान किये जाने की मांग करते हुए कहा कि प्रदेश में कानून व्यवस्था से लेकर किसान समस्याओं पर संतोषजनक कार्य नहीं हो पा रहा है। गन्ना भुगतान एवं ब्याज, आलू की खरीद, धान खरीदने की शत-प्रतिशत व्यवस्था, जंगली जानवरों से हो रहे नुकसान, रंगराजन कमेटी आदि पर विस्तृत चर्चा की। किसानों की समस्याओं पर गौर करते हुए मुख्यमंत्री महोदय ने आश्वासन दिया कि किसानों की इच्छा के विरूद्ध प्रदेश में रंगराजन कमेटी की रिपोर्ट लागू नहीं होगी। किसानों से शत-प्रतिशत धान खरीद की जायेगी। जंगली जानवरों एवं पालतू पशुओं से किसानों की फसल की सुरक्षा हेतु आवश्यक इंतजाम एवं चारागाह की जमीन कब्जामुक्त कराकर पशुशालाओं का निर्माण कराया जाऐगा। किसानों की कर्जमाफी पर पुनर्विचार किये जाने का भी आश्वासन दिया गया। कोल्ड स्टोरेज सम्बन्धित किराया तय करने की धारा 29 को समाप्त करने एवं आलू का निर्यात पर परिवहन सब्सिडी व ग्रेडिंग खत्म करने का आश्वासन दिया। वार्ता में राजेश चौहान, दीवानचंद चौधरी, बलराम लम्बरदार, राजपाल शर्मा, राजवीर सिंह जादौन, केतकी सिंह, हरनाम सिंह वर्मा, धर्मेन्द्र मलिक मौजूद रहे।




ज्ञापन
माननीय,
श्री योगी आदित्यनाथ जी,
मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश सरकार,
लखनऊ।
आदरणीय श्री योगी जी
प्रदेश में भाकियू हमेशा किसानों के लिए संघर्ष करती रही है। प्रदेश की जनसंख्या का 65 प्रतिशत हिस्सा प्रत्यक्ष व अप्रत्यक्ष रूप से कृषि से जुड़ा है। किसान के अत्यधिक परिश्रम के बाद भी उसको उसकी मेहनत के अनुसार लाभ नहीं मिल पाता। किसानों पर कर्ज का भार बढ़ता जा रहा है, एन0एस0एस0ओ0 की रिपोर्ट के अनुसार अगर कोई दूसरा धंधा मिले तो 50 प्रतिशत किसान खेती छोडने को तैयार है। प्रदेश के किसानों की समस्याओं की सूची लम्बी होती जा रही है।
प्रदेश का किसान मानसून की विफलता, सूखा, फसल उत्पादन में प्रयोग होने वाले उत्पादों की कीमतों में वृद्धि और फसलों के मूल्य में गिरावट, ऋण का अत्यधिक बोझ आदि परिस्थितियों के कारण संकट में है। आपकी सरकार ने 36,359 करोड़ रुपये का ऋण माफ कर किसानों को राहत दी है। भाकियू इसका स्वागत करती है। आज दिनांक 31.07.2017 झूलेलाल पार्क, लखनऊ में आयोजित किसान पंचायत के माध्यम से निम्न मांग करती है। किसानों की मुख्य मांगे निम्नलिखित है-
1. फसलों का लाभकारी मूल्य-डॉ0 स्वाममीनाथन रिपोर्ट को लागू किया जाये और किसानों को फसल लागत मूल्य से 60 प्रतिशत अधिक न्यूनतम समर्थन मूल्य देने का फॉर्मूला तुरंत लागू किया जाए। फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे की खरीद को अपराध माना जाये। सभी मुख्य फसलों, फलों, सब्जी व दूध को न्यूनतम समर्थन मूल्य के आधीन लाया जाए।
ऽ प्रदेश के आलू किसानों की पैदावार लागत 800 रूपये प्रति कुन्तल है। आलू का समर्थन मूल्य 1000 रूपये प्रति कुन्तल तय किये जाने एवं ग्रेडिंग समाप्त किये जाने की आवश्यकता है। धारा-29 को समाप्त करते हुए सरकार कोल्ड स्टोर का किराया तय करने का अधिकार अपने पास सुरक्षित करे। किसान हित में आलू का निर्यात कराया जाय।
ऽ धान खरीद हेतु समुचित क्रय केन्द्रों की स्थापना की जाय एवं प्रदेश के सभी किसानों शत-प्रतिशत धान खरीद की जाय।
2. गन्ना- प्रदेश के गन्ना किसानों का बकाया भुगतान अविलम्ब कराया जाए। पिछली सरकार गलत तरीके से तीन सत्रों का गन्ना भुगतान पर मिलने वाला ब्याज गलत तरीके से माफ कर दिया गया था। सरकार के आदेश को उच्च न्यायालय इलाहाबाद द्वारा निरस्त कर दिया गया है। किसानों को ब्याज का भुगतान कराया जाए।
ऽ प्रदेश सरकार के पास केवल गन्ने की फसल मूल्य तय करने का अधिकार है सरकार को यह समाप्त नहीं करना चाहिए। प्रदेश में रंगराजन कमेटी की सिफारिश को लागू नहीं किया जाय।
3. ऋण- प्रदेश सरकार द्वारा की गई ऋण माफी का भारतीय किसान यूनियन स्वागत करती है। सरकार द्वारा जो ऋण माफी की गई है वह पर्याप्त नहीं है। भाजपा की चुनावी घोषणा के अनुसार सभी किसानों का पूर्णतः घोषणा की तारीख तक का कर्ज माफ किया जाय। फसली ऋण ही नहीं सभी तरह के कृषि ऋण शामिल किये जायें।
ऽ खरीफ का ऋण वितरण 1 अप्रैल से 31 अगस्त तक और रबी का ऋण 1 सितम्बर से 31 मार्च तक होता है। किसान को खरीफ व रबी फसली ऋण एक साथ दिया जाए। फसली श्रण का एक चौथाई हिस्सा कृषि आदान के रूप में क्रय करने की अनिवार्यता समाप्त की जाए।
4. बिजली- डार्क जोन में किसानों को निजी नलकूपों के ऊर्जीकरण पर गलत तरीके से लगाये गये प्रतिबन्ध को समाप्त करते हुए किसानों को निजी नलकूप के कनेक्शन जारी किया जाए। किसानों के नलकूप से पूरे प्रदेश में 5 हॉर्स पावर का बिल लिया जाय। सामान्य योजना में किसानों को दी जाने वाली सब्सिडी बढ़ाई जाय। किसानों की लाइन 300 से घटाकर 190 मीटर किये जाने के आदेश को समाप्त किया जाय।
5. भूमि अधिग्रहण- प्रदेश के विभिन्न जनपदों जैसे-कानपुर जनपद की घाटमपुर तहसील के गांव लौहरीमऊ सहित 8 गांव की जमीन नवेली पावर प्लांट हेतु अधिग्रहण की गयी है। जनपद अम्बेड़करनगर के बुद्ध परिपथ, जनपद कानपुर के बिल्लौर क्षेत्र में लखनऊ एक्सप्रेस-वे, कानपुर में रेलवे फ्रंट कॉरिडोर, मेरठ में मेरठ विकास प्राधिकरण, मुजफ्फरनगर-सहारनपुर में रेलवे फ्रंट कॉरिडोर के भूमि अर्जन में किसान लम्बे समय से आंदोलनरत् है। ललितपुर पावर प्लान्ट सहित सभी सम्बन्धित जनपदों के जिलाधिकारी को निर्देशित कर किसानों के साथ वार्ता कर विवादों का समाधान कराया जाए। सभी विवादित अधिग्रहण पर वर्तमान कानून के आधार पर 04 गुना मुआवजा दिलाया जाय।
6. सिंचाई- प्रदेश में नई नहरों के निर्माण एवं चौगामा नहर परियोजना व बुंदेलखण्ड पंचनदा बांध परियोजना को अविलम्ब पूरा किया जाए।
ऽ नहरों के पानी टेल तक पहुंचाने व टेल के किसानों के सम्पर्क नम्बर रखने व उस पर सम्पर्क कर कृषकों से यह सुनिश्चित करने की टेल तक पानी पहुंच रहा है, की कारगर व्यवस्था की जाए एवं प्रदेश के नहरों व बाँधों में जमा सिल्ट को साफ कराया जाय।
7. कृषि वार्निकी- कृषि वार्निकी के अन्तर्गत किसानों द्वारा पॉपलर, सागौन, यू० के० लिप्टिस की खेती की जा रही हैं। किसानों का उत्पीड़न मण्ड़ी समिति व वन विभाग द्वारा किया जा रहा हैं। कृषि वार्निकी के अन्तर्गत आने वाले सभी वृक्षों पर सभी जनपदों में कटाई एवं ढुलाई पर लगाये गये प्रतिबन्ध को समाप्त करते हुए मण्ड़ी शुल्क भी समाप्त किया जायें। मेंथा की खेती किसानों की नकदी फसल है। मेंथा को फसल का दर्जा देते हुए मण्ड़ी शुल्क समाप्त किया जायें।
8. बुंदेलखण्ड-पिछले 10 वर्षो से बुन्देलखण्ड के किसान सूखा व असमय बारिश की मार झेल रहे है, जिससे किसानों पर कर्ज का बडा भार हो गया है। आये दिन बुन्देलखण्ड में किसानों द्वारा आत्महत्या की जा रही है। बुंदेलखंड के किसानों का पलायन रोकने एवम आजीविका के संकट के समाधान हेतु एक संयुक्त समिति का गठन किया जाए। बुन्देलखण्ड़ के किसानों के सभी कर्ज माफ किये जायें।
9. प्रदेश में आवारा पशुओं जैसे नीलगाय, जंगली सुअर आदि के द्वारा किसानों की फसलों को नष्ट किया जा रहा है। सरकार द्वारा इसकी रोकथाम हेतु आवश्यक कार्यवाही की जाये। बुंदेलखण्ड में अन्ना प्रथा पर कानूनी प्रतिबंध लगाया जाए।
10. मुकदमें- आन्दोलन के दौरान किसानों पर सभी मुकदमे वापस लिये जाये। जनपद कुशीनगर एवं फैजाबाद,कानपुर, हमीरपुर में किसानों पर लगाये गये झूठे मुकदमे समाप्त किये जाएं। जेल में बंद किसानों को रिहा किया जाए।
11. किसान आय आयोग का गठन करते हुए किसानों की भागीदारी सुनिश्चित की जाए।
12. प्रदेश में समान शिक्षा सामान्य पाठ्यक्रम लागू करके एक तरह की शिक्षा व्यवस्था लागू किया जाय। प्रदेश में सभी को समान चिकित्सा सुविधा उपलब्ध करायी जाय।
13. प्रदेश के पात्र व्यक्तियों के राशन कार्ड नहीं बन पा रहे हैं इसकी जांच कराकर राशन कार्ड उपलब्ध कराये जायें।
14. प्रदेश में किसानों को पेंशन दी जाय और सभी तरह की पेंशन जैसे विधवा, वृद्धा के बहुत सारे पात्र बजट न होने के कारण इस सुविधा से वंचित रह जाते हैं। इसमें बजट बढ़ाया जाय।

Monday, June 8, 2015

Bhartiya kisan union feedback to joint committee of parliament on the land acquisition amendments bill 2015






अध्यक्ष/सदस्य
संयुक्त संसदीय समिति भूमि अधिग्रहण बिल 2015
लोकसभा सचिवालय कमरा न0 306 तीसरा फ्लोर
संसद भवन एनेक्सी नई दिल्ली।


विषयः- भूमि अधिग्र्रहण बिल 2015 पर भारतीय किसान यूनियन की आपत्ति और सुझाव।

आदरणीय अध्यक्ष/सदस्य

भूमि अधिग्रहण बिल, 2015 को सरकार ने देश के हर कोने से उठ रही विरोधी आवाज व् आन्दोलन को देखते हुए संयुक्त संसदीय समिति को भेजा गया है | 1894 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम के अंतर्गत जबरन, अनुचित और अन्यायपूर्ण तरीके से जमीन अधिग्रहण के अनुभवों के आधार पर, विविध किसान संगठनों के लम्बे संघर्ष के बाद भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013 में समुचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार संसद द्वारा अधिनियमित किया गया था । एक दशक तक चले अभूतपूर्व देशव्यापी परामर्श, संसद में और बीजेपी के नेतृत्व वाली दो स्थायी समितियों में बड़े पैमाने पर बहस के बाद ही 2013 का यह भूमि अधिग्रहण अधिनियम बना, उस वक्त वर्तमान लोकसभा सभापति और स्थायी समिति की अध्यक्ष सुमित्रा महाजन के साथ बीजेपी ने भी तहेदिल से अधिनियम के समर्थन में थी, और खुलकर इस कानून के प्रावधानों का समर्थन कर रही थी |

हम मानते हैं की 2015 का भूमि अध्यादेश / अधिनियम पूरी तरह से, समुचित मुआवजा और पारदर्शिता का अधिकार भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन अधिनियम, 2013, का और अन्यायपूर्ण भूमि अधिग्रहण के खिलाफ सालों के संघर्ष का मजाक है ।
इस अधिनियम के प्रावधान किसानों की बिना अनुमति के उसकी ज़मीन छीनकर कम्पनियों को दे देंगे और दूसरी तरफ बहु फसली ज़मीन या फिर ज़रुरत से ज्यादा ज़मीन का अधिग्रहण भी social impact assessment के प्रावधान को हटाने के कारण लागू हो जाएगा | 

सरकार ने अध्यादेश में जो संशोधन भी लायें है वह सिर्फ कागजी ही दिखता है क्योंकि वह मूल रूप से २०१३ के कानून के मूल उद्देश्यों को खारिज करता है. खेती की ज़मीन का हस्तांतरण, खाद्य सुरक्षा की अनदेखी, लोगों की जीविका, जबरदस्ती भूमि अधिग्रहण पर रोक, अधिग्रहित भूमि को किसानों को वापसी आदि जैसे मुद्दों को २०१३ का कानून कुछ हद्द तक सम्बोधित करता था, पर वह भी ख़तम कर दिया गया है |

यह सरकार भी जानती है कि जमीनें पीढ़ी दर पीढ़ी आजीविका मुहैय्या कराती हैं और मुआवजा कभी भी वैकल्पिक आजीविका नही दे सकते हैं ! यह सभी जानते हैं कि जब भारत में कृषि योग्य ज़मीनें व किसान नही बचेंगें तो देश की खाद्य संप्रभुता समाप्त हो जायेगी और देश खाद्य के मामले ऑस्ट्रेलिया और अमेरिका जैसे देशों पर निर्भर हो जाएगा ,तथा साथ साथ ज़मीन से जुड़े हुए भूमिहीन किसान और खेत मज़दू णर तथा ग्रामीर, दस्तकार ,छोटे व्यापारी देश के नक़्शे से ही गायब हो जायेंगे। उसके बाबजूद भी जमीनों के चार गुना मुआवजा देकर अधिग्रहण की बात कर रही सरकार अपने आप को किसानो का सबसे बड़ा हितैषी बता रहे हैं, जबकि सच्चाई तो यह है कि भाजपा शासित राज्यों की सरकारे अति उपजाऊ ज़मीन का भी मुआवजा मात्र दो से ढाई गुना पर निपटा रही हैं |  

समिति के  सामने भारतीय किसान यूनियन  कुछ सुझाव रखना चाहती  हैं और बतलाना चाहते हैं की सरकारी संशोधन सिर्फ दिखावे हैं, आज जरूरत है की कृषि संकट को दूर किया जाए और खेती एक जीविका का उत्तम साधन बन सके लोगों के लिए |






संशोधन
 मूल अधिनियम
1.     
अध्यादेश में  परियोजनाओं की एक विशेष श्रेणी (नया सेक्शन 10अ) बनाई गई है जिसमें सहमति लेने, सामाजिक प्रभाव आंकलन की जरुरत, विशेषज्ञ समूह से  समीक्षा कराने, बहुफसलीय/ खेती की जमीन लेने की  छूट है.  

इस विशेष श्रेणी के पांच विषय/आइटम हैं: औद्योगिक गलियारे  और आधारभूत सुविधाओं वाली परियोजनाएं जिनमें पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप की परियोजनाएं शामिल हैं. अधिकांश अधिग्रहण इन्हीं दो श्रेणियों के अंतर्गत होने का असर यह होगा कि 2013 के मूल कानून के सुरक्षा उपाय पूरी तरह ख़त्म  हो जायेंगे.

‘सोशियल इन्फ्रास्ट्रक्चर’ को इस नई श्रेणी में शामिल किया गया था और बाद में सरकार द्वारा ही इसे वापस ले लिया गया.
2013 के कानून में इस तरह का कोई क्लॉज़ नहीं था. ये सभी गतिविधियाँ अध्याय 2 और 3 के लिए निर्धारित  प्रक्रिया को पूरा करने के लिए आवश्यक थीं.

सेक्शन 2(2) में परियोजना की मंजूरी हेतु (70-80%) प्रभावित परिवारों से सहमति लेना आवश्यक था.

एक नया प्रावधान जोड़ दिया गया है इससे सेक्शन 10अ से उन सभी निर्धारित गतिविधियों को हटा दिया गया है जो  सहमति के दायरे में आती थीं.
2.     
10अ की नई श्रेणी में बचाव के नए सेक्शन जोडे गए हैं:  अध्यादेश के जरिये नये सेक्शन में दो नए प्रावधान सरकार ने जोड़े.

मूलतः इसके जरिये सरकार यह सुनिश्चित करने की कोशिश करती है कि परियोजना के लिए ली जाने वाली जमीन के लिए कम से कम सवालात हों. दूसरा प्रावधान सरकार को बंजर जमीन का सर्वेक्षण करने का आदेश देता है

2013 के कानून में मौजूद सामाजिक प्रभाव आंकलन को  असावधानी से  जोड़ा गया है.

परियोजनाओं को सामाजिक प्रभाव आंकलन प्रक्रिया के दायरे से बाहर रखने के लिए सरकार सामाजिक प्रभाव आंकलन की निर्धारित छह शर्तों में से एक शर्त को ही शामिल किया.     

सामाजिक प्रभाव आंकलन को लागु करने की बजाय सरकार ने उसके प्रति उठने वाली चिंताओं को दबाने के लिए इसे सूक्ष्म और तुच्छ बना दिया.
3.     
पहले के क्लॉज़ में महत्वपूर्ण संशोधन सेक्शन 24(2) शामिल किया गया. सेक्शन में संशोधन करके मुकदमेबाजी के समय को बाहर रखा गया जहाँ स्थगन आदेश की अवधि को पूरा करना आवेदक के लिए जरूरी हो.

इसके अलावा सुप्रीम कोर्ट द्वारा निर्धारित मुआवजे की परिभाषा को अमान्य घोषित कर दिया गया.

2013 का कानून सेक्शन 24(2) जमीन पे सीधा कब्जा न होने या मुआवजा न दिए जाने की स्थिति में जमीन वापस लौटाने की अनुमति देता है.

अब आवेदकों के लिए नई आवश्यकताओं को पूरा करना और भी मुश्किल कर दिया गया.

कानून यह बताता कि देय मुआवजे का क्या आशय है इसे अदालतों पर छोड़ दिया गया. सुप्रीम कोर्ट द्वारा मुआवजे से आशय है कोर्ट में या सीधा लाभार्थी के खाते में पैसे जमा करना.  
4.     
नियमों का उल्लंघन करने वाले अधिकारीयों के खिलाफ कार्यवाही मंजूरी के बाद ही हो सकेगी. नए संशोधन में आपराधिक प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के तहत सरकार से अनुमति मिलने के बाद ही कार्यवाही हो सकेगी.

2013 कानून की धारा 87 में अधिकारीयों को कानून को लागू करने के लिए ज्यादा जवाबदेह बनाया गया  और उल्लंघन किये जाने की स्थिति में दंड का प्रावधान भी है. किसी प्राधिकरण से पूर्व अनुमति लेने की जरुरत नहीं है.

5.     
उपयोग न हुई जमीन को लौटाने के प्रावधान को कमजोर किया गया.  अध्यादेश में संशोधन करके पांच साल की अवधि को खत्म करके ‘परियोजना की स्थापना की निर्धारित अवधि या पांच साल जो भी बाद में हो’ को किया गया.
2013 के कानून की धारा 101 में पांच साल तक जमीन का इस्तेमाल न होने पर वापस करने (जमीन के मालिक को या राज्य भूमि बैंक) की बात कही गयी.
6.     
सरकार को दो से पांच साल में कानून लागू करने का विशेष अधिकार. इससे कानून की व्याख्या करने के लिए जरुरी किसी भी कदम को सरकार ले सकती है.   
2013 के कानून की धारा 113 में सरकार कानून पास होने के दो साल के बाद उसे लागू करने के लिए आवश्यक कोई भी कदम ले सकती है.
7.     
‘निजी संस्था’ की परिभाषा को विस्तारित किया गया ताकि स्वामित्व, साझेदारी, गैर-लाभ का संगठन या कोई अन्य संस्था को शामिल किया जा सके. इसका मतलब है कि ये संस्थाएं सरकार से सार्वजानिक उद्देश्य के लिए जमीन अधिग्रहित करने के लिए अनुरोध कर सकती हैं. 

2013 का कानून या तो सरकारी संस्थाओं या सरकार के जरिये निजी कम्पनियों के लिए ही जमीन के अधिग्रहण की इजाजत देता है. अधिग्रहण का मतलब यह बिलकुल भी नहीं कि किसी भी संस्था के लिए निर्दयतापूर्वक जमीन ली जाये.
8.     
औद्योगिक गलियारों का विस्तार: सरकार ने औद्योगिक गलियारे के विस्तार की परिभाषा में नया संशोधन किया है अब औद्योगिक गलियारे में सड़क या रेलवे लाईन के एक या दोनों तरफ एक एक किलोमीटर जमीन लेने की बात कही गयी है   
 यह परियोजना गतिविधियों के वृहद विस्तार है जो अध्यादेश के जरिये पहले ही सरकार पेशा कर चुकी है.

सामाजिक प्रभाव आंकलन का भी यह उल्लंघन है जिसमें परियोजना के लिए कम से कम जमीन के विस्तार की बात कही गयी .

इसका बेहतरीन उदाहरण है यमुना एक्सप्रेस-वे, जिसमें एक्सप्रेस-वे परियोजना  के किसी भी तरफ अतिरिक्त जमीन  ली गई और बाद में उसे उत्तर प्रदेश में जेपी ग्रुप को दे दिया गया.
9.     
खेतिहर मजदूर के लिए अनिवार्य रोजगार . एक नया सेक्शन डालकर खेतिहर मजदूर के लिए रोजगार अनिवार्य किया गया.
यह संशोधन गुमराह करने वाला, सतही और एकपक्षीय है. 2013 का कानून दूसरी अनुसूची के आइटम 4 के तहत अनिवार्य रोजगार देता है.

वास्तव में यह और अन्य लाभ, बड़ी संख्या में भूमिहीनों को दिए जाते जिनकी आजीविका प्रभावित होगी न कि सिर्फ खेतिहर मजदूर को (जिन्हें प्रभावित परिवार की श्रेणी में रखा गया ). 

यह संशोधन संविधान की धारा 14 का उल्लंघन है क्योंकि यह  स्पष्ट किये बिना एक अलग तरह की प्रजाति बनाता है.
10.  
नया सेक्शन 67अ: अर्धन्यायिक प्राधिकरण अब भूमि अधिग्रहण पुनर्वास और पुनर्वसन प्राधिकरण के रूप में  जाना जायेगा जो उस जिले में सुनवाई करेगा, जहाँ अधिग्रहण किया जा रहा हो.

इस संशोधन की जरूरत नहीं थी क्योंकि एलएआरआर प्राधिकरण एक स्वतंत्र निकाय है जो स्वतंत्र रूप से निर्णय ले सकता है.

हालाँकि, वास्तविक रूप में यह एलएआरआर प्राधिकरण की संरचना या कार्यों में कमी नहीं कर सका.


भारतीय किसान यूनियन आशा करती है कि समिति को दिए गए सुझावों पर गंभीरता से चिंतन करते हुए अपनी राय में शामिल कर सरकार को देगी |  |   
                                            भवदीय   
चौ.नरेश टिकैत                                                      चौ युधवीर सिंह   
(राष्ट्रीय अध्यक्ष )                                               (राष्ट्रीय महासचिव )



Friday, March 27, 2015

भाकियू पर्तिनिधिमंडल ने कृषि उत्पादन आयुक्त से मिलकर किसानो की आत्महत्या व् फसलो का उचित मुआवजा दिए जाने की मांग करते हुए कहा ---

भाकियू पर्तिनिधिमंडल ने कृषि उत्पादन आयुक्त से मिलकर किसानो की आत्महत्या व् फसलो का  उचित मुआवजा दिए जाने की मांग करते हुए कहा ---






माननीय,
श्री अखिलेश यादव,
मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश, सरकार लखनऊ।
विषय:-   प्राकृतिक आपदा से पूर्णतः नष्ट हुई किसानों की फसलों का उचित मुआवजा अविलम्ब दिये जाने हेतु।
महोदय,
आपके पूर्व से ही संज्ञान में है कि प्रदेश में आयी प्राकृतिक आपदा से किसानों की फसलें पूर्णतः नष्ट हो गई है। यह आपदा ऐसे समय आयी है कि जब किसानों की फसलें पूर्ण रूप से तैयार हो चुकी थी। फसलों की बर्बादी को देखकर किसान हताश व निराश होकर मौत को गले लगे रहे है। प्रदेश में सैकडों के आसपास किसान आत्महत्या कर चुके है। आत्महत्याओं का यह सिलसिला बादस्तूर जारी है, जो रूकने का नाम नहीं ले रहा है। प्रदेश में लगभग दो हजार करोड से अधिक किसानों की फसलों का नुकसान हुआ है। ऐसी स्थिति में सरकार को दिल खोलकर किसानों की मदद किये जाने की आवश्यकता है। अभी तक सरकार द्वारा जो कदम उठाए गए है, वह नाकाफी है। प्रदेश में किसानों पर आजीविका एवं कर्ज चुकाए जाने का संकट खडा हो गया है।
भारतीय किसान यूनियन मांग करती है कि किसानों को खाद्य फसलों पर 25 हजार रुपये व नगदी फसलों पर 50 हजार रुपये एकड की दर से मुआवजा घोषित करते हुए किसानों के सभी तरह के कर्ज  (निजी व सरकारी) व बिजली के बिल माफ किये जाए।
किसानों ने कर्ज के भार के कारण आत्महत्याएं की है। जिसका बडा आंकडा बुन्देलखण्ड से मिल रहा है। आत्महत्या करने वाले किसानों के परिवार को 10 लाख रुपये का मुआवजा व परिवार के एक सदस्य को नौकरी का प्रावधान किया जाए।
आशा है कि जल्द से जल्द किसान हित में उपरोक्त राहत दिये जाने का कार्य उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा किया जाएगा।
भवदीय
चै. नरेश टिकैत          श्री राजेश सिंह चैहान
(राष्ट्रीय अध्यक्ष भाकियू) (प्रदेश अध्यक्ष भाकियू)

Friday, January 9, 2015

भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को रद्द किये जाने के सम्बंध में।

भारतीय किसान यूनियन द्वारा भूमि अधिग्रहण अधयादेश के विरोध में उत्तर प्रदेश के सभी जनपदों में 7 जनवरी  को जिलाधिकारी कार्यालयों में प्रदर्शन कर अधयादेश को रद्द करने की मांग करते हुए  देश के प्रधानमंत्री के नाम संबोधित ज्ञापन दिया गया | भाकियू के अध्यक्ष चौ.नरेश टिकैत ने  मुज़फ्फरनगर  के धरने में शामिल होकर अपना विरोध दर्ज करते हुए कहा कि किसान विरोधी कानून मंजूर नहीं है |

ज्ञापन
माननीय,
      श्री नरेन्द्र मोदी जी
      प्रधानमंत्री भारत सरकार
      साउथ ब्लाक, नई दिल्ली।
विषयः- भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को रद्द किये जाने के सम्बंध में।
मान्यवर,
देश में जब खेती योग्य जमीने किसानों से कोडियों के भाव अधिग्रहित कर उद्योगपतियों को दी जा रही थी, तो देश के किसानों ने भूमि अधिग्रहण के विरूद्ध मुखर आन्दोलन किया। जिसके कारण अनेक राज्यों में किसानों और पुलिस के बीच टकराव के दौरान कई किसानों की जाने भी चली गई, लेकिन किसान इस लडाई को अंजाम तक पहुचाने के लिए जान की बाजी लगाने से भी पीछे नहीं हट रहे थे। किसानों के संघर्ष और बलिदानों के बाद भारत सरकार व देश के राजनैतिक दलों पर दबाव के कारण भारत सरकार ने 1894 के भूमि अधिग्रहण कानून को रद्द कर भूमि अधिग्रहण कानून ‘ उचित मुआवजे का अधिकार एवं भूमि अधिग्रहण में पादर्शिता, पुनर्वास एवं पुनस्र्थापना अधिनियम 2013’ को लाया गया। 122 साल पुराने कानून के रद्द होने से किसानों को यह अहसास हुआ था कि हम भी आजाद देश के नागरिक है और अब हमारी जमीन को जबरन नहीं छीना जा सकता। इस कानून को बनाते समय दो सर्वदलीय बैठकें, बिल पर संसद में चर्चा तथा विपक्ष के दो महत्वपूर्ण संशोधन को मानते हुए सरकार ने कानून में शामिल कर लिया था। संसद की स्थायी समिति द्वारा की गयी 28 सिफारिशों में से 26 को स्वीकार कर कानून में शामिल कर किया गया था। भारतीय जनता पार्टी द्वारा भी इस बिल का समर्थन किया गया था।
भारत सरकार द्वारा लाये गए अध्यादेश में पीपीपी प्रोजेक्ट के लिए 70 प्रतिशत तथा निजी कम्पनियों के लिए 80 प्रतिशत प्रभावित किसानों की सहमति की अनिवार्यता के प्रावधान को समाप्त किया जाना, सामाजिक प्रभाव अध्ययन की अनिवार्यता न्यूनतम बहुफसली खेती की जमीन के अधिग्रहण करने के प्रावधान को समाप्त करने तथा धारा 24(2) में पांच वर्ष की समय सीमा समाप्त करने से विकास के नाम पर जमीन की लूट को कानूनन मान्यता दे दी गई है। पांच वर्ष के अंदर अगर अधिग्रहित भूमि का उपयोग नहीं होता है। तो उसे मूल मालिक को लौटाने का प्रावधान भी समाप्त कर दिया गया है। अब बिना उपयोग किये हुए भी भूमि लम्बे समय तक उद्योगपति अपने पास रख सकते है। (सेक्शन 101 में संशोधन) सरकार ने खुद को नये कानून को लागू करने में पैदा होने वाली किसी भी कठिनाई को हटाने के लिए नोटीफिकेशन जारी करने की समय सीमा को दो से बढ़ाकर 5 साल कर दिया गया है।
भारत के किसानों को आशंका है कि इस कानून से  देश के किसानों की जबरन भूमि अधिग्रहण का रास्ता साफ होगा।
भारतीय किसान यूनियन दिनांक 07 जनवरी 2015 को जिलाधिकारी कार्यालय मुज़फ्फरनगर  उत्तर प्रदेश पर प्रदर्शन के माध्यम से मांग करती है कि भूमि अधिग्रहण कानून 2013 में लाए गए अध्यादेश को अविलम्ब रद्द किया जाए।
                                                                                                                                                         भवदीय

                                                                                                                                                      नरेश टिकैत 



Monday, January 5, 2015

भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को रदद कराने के लिए भाकियू करेगी देशव्यापी आन्दोलन, उत्तर प्रदेश के सभी मुख्यालयों पर सात जनवरी को भाकियू करेगी प्रदर्शन: भाकियू

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भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को रदद कराने के लिए भाकियू करेगी देशव्यापी आन्दोलन, उत्तर प्रदेश के सभी मुख्यालयों पर सात जनवरी को भाकियू करेगी प्रदर्शन: भाकियू
किसानों की जोर-जबरदस्ती से जमीन छीनने का कानून है नया भूमि अध्यादेश: राकेश टिकैत
मोदी सरकार द्वारा भूमि अधिग्रहण के सम्बंध में लाए गए अध्यादेश से स्पष्ट है कि कार्पोरेट को किसानों की लूट को छूट देने वाला अध्यादेश है। भारतीय किसान यूनियन भारत सरकार से इस अध्यादेश को तत्काल वापिस लेने की मांग करती है। सरकार ने उचित मुआवजे का अधिकार एवं पुनस्र्थापना अधिनियम 2013 में किसानों के पक्ष के सभी प्रावधानों को संशोधित कर, वर्तमान कानून को 1894 के अंगे्रजी कानून से भी बदत्तर बना दिया है।
देश के विभिन्न राज्यों में भूमि अधिग्रहण के विरोध में विभिन्न हिंसक आन्दोलन और सैकड़ों किसानों की जान की कुर्बानी के दबाव के चलते दो साल तक व्यापक बहस के बाद भूमि अधिग्रहण कानून में बदलाव किया गया था। कई राज्यों में भूमि अधिग्रहण के आन्दोलन से सरकार भी बदल गई थी। भूमि अधिग्रहण कानून 1894  के बल पर किसानों की जमीनें सस्ते में खरीद कर उद्योगपतियों को देने की मान्यता देता था।
भारतीय किसान यूनियन ने कई बडे आन्दोलन कर पुराने भूमि अधिग्रण बिल को रद्द कराने में अहम भूमिका निभाई थी। भारतीय किसान यूनियन के राष्ट्रीय प्रवक्ता चैधरी राकेश टिकैत के नेतृत्व में संसद की स्थाई समिति के समक्ष देश के किसानों का पक्ष रखते हुए अपनी बात मनवाने में सफलता हासिल की थी।
भारत सरकार द्वारा लाये गए अध्यादेश में पीपीपी प्रोजेक्ट के लिए 70 प्रतिशत तथा निजी कम्पनियों के लिए 80 प्रतिशत प्रभावित किसानों की सहमति की अनिवार्यता के प्रावधान को समाप्त किया जाना, सामाजिक प्रभाव अध्ययन की अनिवार्यता न्यूनतम बहुफसली खेती की जमीन के अधिग्रहण करने के प्रावधान को समाप्त करने तथा धारा 24(2) में पांच वर्ष की समय सीमा समाप्त करने से विकास के नाम पर जमीन की लूट को कानूनन मान्यता दे दी गई है। पांच वर्ष के अंदर अगर अधिग्रहित भूमि का उपयोग नहीं होता है। तो उसे मूल मालिक को लौटाने का प्रावधान भी समाप्त कर दिया गया है। अब बिना उपयोग किये हुए भी भूमि लम्बे समय तक उद्योगपति अपने पास रख सकते है। (सेक्शन 101 में संशोधन) सरकार ने खुद को नये कानून को लागू करने में पैदा होने वाली किसी भी कठिनाई को हटाने के लिए नोटीफिकेशन जारी करने की समय सीमा को दो से बढ़ाकर 5 साल कर लिया गया है ताकि किसानों की जमीन की लूट आसान बनी रहे। मोदी सरकार के गठन के बाद से ही  किसानों में सरकार की तरफ से की जा रही है, बयानबाजी से यह आशंका बनी हुई थी कि सरकार द्वारा अब तक बने जनहितेषी कानूनों में बदलाव किया जाएगा, जो सच साबित हुई।
भारतीय किसान यूनियन भूमि अधिग्रहण अध्यादेश को रद्द कराने हेतु देशव्यापी आन्दोलन की शुरूआत 7 जनवरी 2015 से उत्तर प्रदेश के जिला मुख्यालयों पर प्रदर्शन कर अपना विरोध दर्ज कराएगी। भारतीय किसान यूनियन के वार्षिक राष्ट्रीय अधिवेशन 16 से 18 जनवरी 2015 तक इलाहाबाद में किया जाएगा। जिसमें भारतीय किसान यूनियन भूमि अधिग्रहण बिल, फसलांे का लाभकारी मूल्य, देश में राॅ शुगर के आयात पर प्रतिबंध व विश्व व्यापार संगठन के विरोध में आन्दोलन की बडी रणनीति की घोषणा करेगी।
     भवदीय

  चैधरी राकेश टिकैत
   (राष्ट्रीय प्रवक्ता भाकियू)

Monday, December 9, 2013

उत्तर प्रदेश में गन्ने को लेकर ग़दर ,हिली अखिलेश सरकार






















उत्तर प्रदेश में गन्ना किसान बकाया भुगतान व् गन्ना मुल्य में वृधि को लेकर सरकार के खिलाफ सडको पर है .भारतीय किसान यूनियन के अध्यक्ष चौ.नरेश टिकैत के आह्वान पर प्रदेश के गन्ना किसानो ने समाधान न होने पर 5 दिसम्बर को प्रदेश भर में सडको व् रेल मार्ग को जाम कर दिया.।चौ.टिकैत ने कहा कि जाम से आम जन की दिक्कत हुए ,लेकिन सरकार के किसान विरोधी रुख के कारन अन्नदाता को यह सब करना पड़ा....किसान ने करवट बदली तो लखनऊ तक गूंज सुनाई दी ।